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पैसे खत्म हुए तो घर लौटने को हुए मजबूर
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गुजराज के राजकोट से आए रेवती क्षेत्र हडिहा कला गांव के प्रवासी श्रमिक।
- फोटो : BALLIA
बलिया। लॉकडाउन में जब जेब खाली हो गई। भोजन की व्यवस्था करना मुश्किल था। बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे थे तो मजबूर होकर परिवार के साथ घरों को लौटना पड़ा। यह पीड़ा लॉक डाउन में परेशान होकर गुजरात और हरियाणा से लौटने वाले मजदूरों की है। लॉकडाउन ने इनमें से कई मजदूरों के अरमानों पर पानी फेर दिया।
रोडवेज परिसर में मौजूद रेवती थाना क्षेत्र के हड़िहाकला गांव निवासी कौशल कुमार प्रसाद पांच बच्चों और पत्नी शीला के साथ पांच वर्ष पूर्व गुजरात के राजकोट गया था। तब उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब बच्चे भूख से बिलबिलाते को मजबूर होंगे। कौशल ने बताया कि लाक डाउन में काम बंद हो गया। मालिक ने पगार देने से मना कर दिया। हालात सामान्य होंगे यह सोचकर वह रोजकोट में टिका रहा लेकिन जब पैसे खत्म हो गये तो वापसी के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा। एक स्वयंसेवी की ओर से श्रमिक स्पेशल ट्रेन में बैठाया गया। जिससे प्रदेश के बलरामपुर और वहां रोडवेज बस से बलिया पहुंचे।
चित्तू पांडेय चौराहे पर मौजूद आलम गड़वार थाना क्षेत्र के बलेसरा गांव निवासी दुर्गेश कुमार ने बताया कि व दो वर्ष पूर्व परिवार के साथ बहादुरगढ़ पहुंचा और नौकरी कर जीवन यापन कर रहा था। लाकडाउन में काम धंधे बंद हो गया। जमा पूंजी भी खत्म हो गई। आखिरकार घर लौटना पड़ा। हरियाणा सरकार ने सरकारी बस से बार्डर तक पहुंचाया। इसके बाद मुरादाबाद से रोडवेज की बस से बलिया पहुंचे। यहां से गांव जाने के लिए प्राइवेट साधनों से सफर करने में धन की कमी आड़े आ गई। दुर्गेश की पत्नी कल्पना की मानें तो परदेश में बगैर पैसे के एक दिन रहना दुश्वार है। ऐसे में 25 सदस्यों के साथ रहना तो और मुश्किल हो जाता है। बताया कि परिवार में दस बच्चे, चार महिलाएं और 11 पुरुष हैं। बैरिया थाना क्षेत्र के धतुरीटोला गांव निवासी राजेश और सोनू साहनी भी लॉकडाउन की मार से बेरोजगार होकर घर लौटने को मजबूर हुए।
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रोडवेज परिसर में मौजूद रेवती थाना क्षेत्र के हड़िहाकला गांव निवासी कौशल कुमार प्रसाद पांच बच्चों और पत्नी शीला के साथ पांच वर्ष पूर्व गुजरात के राजकोट गया था। तब उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब बच्चे भूख से बिलबिलाते को मजबूर होंगे। कौशल ने बताया कि लाक डाउन में काम बंद हो गया। मालिक ने पगार देने से मना कर दिया। हालात सामान्य होंगे यह सोचकर वह रोजकोट में टिका रहा लेकिन जब पैसे खत्म हो गये तो वापसी के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा। एक स्वयंसेवी की ओर से श्रमिक स्पेशल ट्रेन में बैठाया गया। जिससे प्रदेश के बलरामपुर और वहां रोडवेज बस से बलिया पहुंचे।
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चित्तू पांडेय चौराहे पर मौजूद आलम गड़वार थाना क्षेत्र के बलेसरा गांव निवासी दुर्गेश कुमार ने बताया कि व दो वर्ष पूर्व परिवार के साथ बहादुरगढ़ पहुंचा और नौकरी कर जीवन यापन कर रहा था। लाकडाउन में काम धंधे बंद हो गया। जमा पूंजी भी खत्म हो गई। आखिरकार घर लौटना पड़ा। हरियाणा सरकार ने सरकारी बस से बार्डर तक पहुंचाया। इसके बाद मुरादाबाद से रोडवेज की बस से बलिया पहुंचे। यहां से गांव जाने के लिए प्राइवेट साधनों से सफर करने में धन की कमी आड़े आ गई। दुर्गेश की पत्नी कल्पना की मानें तो परदेश में बगैर पैसे के एक दिन रहना दुश्वार है। ऐसे में 25 सदस्यों के साथ रहना तो और मुश्किल हो जाता है। बताया कि परिवार में दस बच्चे, चार महिलाएं और 11 पुरुष हैं। बैरिया थाना क्षेत्र के धतुरीटोला गांव निवासी राजेश और सोनू साहनी भी लॉकडाउन की मार से बेरोजगार होकर घर लौटने को मजबूर हुए।
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