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खरीदार के अभाव में डालियों पर मुरझा रहे फूल
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बलिया। कोरोना के चलते लागू लॉकडाउन ने वैसे तो सभी तरह के उद्योगों पर दुष्प्रभाव डाला है, लेकिन सर्वाधिक असर जिले के विभिन्न क्षेत्रों होने वाली फूलों की खेती और सिकन्दरपुर के फूल और तेल के कुटीर उद्योग पड़ा है। इसके अलावा दुबहड़ ब्लॉक के माधोपुर, तिवारी बरहटा आदि गांवों में होने वाली गेंदा के फूलों की खेती खरीदार के बिना किसानों के लिए बोझ बन गई है। आलम यह है कि बगानों में रोजाना गुलाब समेत गेंदा आदि के फूल तो खिल रहे हैं, लेकिन खरीदार के अभाव में डालियों पर मुरझा जा रहे हैं। कारण कि सट्टियां (फूल क्रय केंद्र) व तेल, गुलाब जल, गुलाबकन्द, इतर बनाने वाले कारखाने बन्द हैं। ऐसे में फूल उत्पादक किसान अपने उत्पाद की बिक्री कहां करें, उन्हें समझ में नहीं आ रहा है। किसानों की आंखों के सामने बागानों में पौधों से खेतों में गिर कर नष्ट हो रहे गुलाब और गेंदा के फूल उनके दिलों पर हथौड़े जैसा चोट कर रहे हैं। गुलाब की खेती करने वालें नियाज अहमद ने कहा कि गुलाब के फूल से गुलाब जल, गुलाबकन्द, गुलाब शर्करी आदि बनती हैं। लॉकडाउन के चलते इन सामग्रियों का निर्माण करने वाले कारखानों के बन्द हो जाने से अपना फूल बेचने में हमें काफी कठिनाई हो रही है।
मुमताज खां ने कहा कि लगन के दिनों में गुलाब का फूल माला, सेहरा बनाने के काम आता है। उस दौरान इसकी मांग काफी बढ़ जाती है। लॉकडाउन के चलते इस समय शादी विवाह आदि के कार्यक्रम ठप पड़ जाने से फूल की मांग नहीं है, जिससे पूंजी बर्बाद हो रही है। कारोबारियों की मानें तो जिले में प्रति वर्ष पांच करोड़ रूपये के फूल का कारोबार होता है। लेकिन इस बार यह दायरा पांच लाख में सिमट गया है। यानि कि इस वर्ष कारोबार में 90 फीसदी की गिरावट आई है।
लॉकडाउन के बाद फूलों की खेती पर संकट छा गया। गेंदा, गुलाब, चमेली आदि फूलों की बिक्री नहीं होने से पूंजी बचाने का संकट पैदा हो गया है। जबकि कड़ाके की धूप के कारण भी पौधे सूख गए। प्रतिवर्ष फूल की खेती से 50 हजार से अधिक मुनाफा होता था, लेकिन इस वर्ष इसका नुकसान हुआ है।
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प्रदीप कुमार पुष्पक
डाउन से काफी प्रभावित हुई है। कोरोना महामारी में सभी मन्दिर, मांगलिक कार्यक्रम सहित अन्य आयोजन बन्द होने से फूल को कोई खरीदने वाला नहीं था। जिससे लाखों रुपये का नुकसान हो गया। फूल की आमदनी से पूरे घर का खर्चा चलता था।
बजरंगी यादव
अन्य फसलों की तरह फूलों की सरकारी खरीदारी होनी चाहिए जिससे किसानों की कम से कम पूंजी तो वापस मिल सके। यदि यह सम्भव न हो तो सरकार को फूल की खेती करने वाले किसानों को मुआवजा देना चाहिए ताकि उन्हें राहत मिल सके।
रामबचन
खेत में फूल तैयार हैं, लेकिन खरीदार नहीं हैं। जिससे हमारी परेशानी बढ़ गई है। खेत से फूल तोड़ कर उसे हम कहां बेचें, यह हमारे समझ में नहीं आ रहा है। फूल के सारे काश्तकार इस सीजन में खून के आंसू रो रहे हैं क्योंकि उसकी खेती में लगी पूंजी और किए गए श्रम पर पानी फिर रहा है।
खेदू
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मुमताज खां ने कहा कि लगन के दिनों में गुलाब का फूल माला, सेहरा बनाने के काम आता है। उस दौरान इसकी मांग काफी बढ़ जाती है। लॉकडाउन के चलते इस समय शादी विवाह आदि के कार्यक्रम ठप पड़ जाने से फूल की मांग नहीं है, जिससे पूंजी बर्बाद हो रही है। कारोबारियों की मानें तो जिले में प्रति वर्ष पांच करोड़ रूपये के फूल का कारोबार होता है। लेकिन इस बार यह दायरा पांच लाख में सिमट गया है। यानि कि इस वर्ष कारोबार में 90 फीसदी की गिरावट आई है।
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लॉकडाउन के बाद फूलों की खेती पर संकट छा गया। गेंदा, गुलाब, चमेली आदि फूलों की बिक्री नहीं होने से पूंजी बचाने का संकट पैदा हो गया है। जबकि कड़ाके की धूप के कारण भी पौधे सूख गए। प्रतिवर्ष फूल की खेती से 50 हजार से अधिक मुनाफा होता था, लेकिन इस वर्ष इसका नुकसान हुआ है।
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प्रदीप कुमार पुष्पक
डाउन से काफी प्रभावित हुई है। कोरोना महामारी में सभी मन्दिर, मांगलिक कार्यक्रम सहित अन्य आयोजन बन्द होने से फूल को कोई खरीदने वाला नहीं था। जिससे लाखों रुपये का नुकसान हो गया। फूल की आमदनी से पूरे घर का खर्चा चलता था।
बजरंगी यादव
अन्य फसलों की तरह फूलों की सरकारी खरीदारी होनी चाहिए जिससे किसानों की कम से कम पूंजी तो वापस मिल सके। यदि यह सम्भव न हो तो सरकार को फूल की खेती करने वाले किसानों को मुआवजा देना चाहिए ताकि उन्हें राहत मिल सके।
रामबचन
खेत में फूल तैयार हैं, लेकिन खरीदार नहीं हैं। जिससे हमारी परेशानी बढ़ गई है। खेत से फूल तोड़ कर उसे हम कहां बेचें, यह हमारे समझ में नहीं आ रहा है। फूल के सारे काश्तकार इस सीजन में खून के आंसू रो रहे हैं क्योंकि उसकी खेती में लगी पूंजी और किए गए श्रम पर पानी फिर रहा है।
खेदू