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पहले बूथों पर होती थी दबंगई, अब नहीं चलता किसी का जोर

Tue, 25 Jan 2022 11:06 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 25 Jan 2022 11:06 PM IST
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Earlier there was bullying on the booths, now no one's emphasis
अतीत के झरोखे से-----------------
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पहले होती थी दबंगई, अब नहीं चलता किसी का जोर
लालगंज। वर्ष 1989 के पहले हुए चुनाव में जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत पर वोटिंग होती थी। दो चार लोगों द्वारा बूथ कैप्चर कर जितनी इच्छा उतना वोट डाल लेते थे। कभी-कभी दो पार्टियों के समर्थक वोटों का बंटवारा भी कर लेते थे। हमलोगों ने चुनाव का वो दौर भी देखा है । ये कहना है मुरारपट्टी निवासी 78 वर्षीय अम्बिका तिवारी का। आगे उन्होंने बताया कि लेकिन 1990 में टीएन शेषन के चुनाव आयुक्त बनने के बाद सब कुछ बदल गया। मतदाता पहचान पत्र से वोगस वोटों पर अंकुश लगा। इसके साथ ही चुनाव में खर्च सीमा निर्धारित हुई, लेखा-जोखा का प्रावधान कर दिया, धर्म के नाम पर वोट मांगने पर प्रतिबंध लगा दिया साथ ही बूथों पर केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी।

1974 की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि बनवारी बाबू, बाबू मैनेजर सिंह व लाल वीरेंद्र विक्रम सिंह चुनाव लड़े थे। पहले चुनाव में वोट देने के लिए झंडा व तिरपाल पर बैठकर वोटर पर्ची काटने का काम किया जाता था। अधिकतर बूथों पर एक ही पार्टी का झंडा लगा रहता था और दूसरे पार्टी का झंडा व तिरपाल नहीं लग पाता था। उस चुनाव में बहुआरा के बूथ पर गांव वाले कांग्रेस का झंडा गाड़ने व तिरपाल बिछाने भी नहीं दे रहे थे तो हृदयपुर पंचायत के उस समय के प्रधान रहे श्रीराम यादव उर्फ साभा यादव व बहुआरा के कुछ कांग्रेस के समर्थकों ने बड़ी मान मनव्वल कर कांग्रेस का झंडा गाड़ा और पर्ची काटने के लिए तिरपाल बिछाया। क्षेत्र के चाहे दोकटी का बूथ हो चाहे दलकी नम्बर एक का चाहे लच्छूटोला का बूथ हर जगह किसी न किसी एक ही पार्टी का झंडा व तिरपाल लगता था और उसी पार्टी के पक्ष में वोटिंग होती थी। कुछ बूथों पर तो लोग ही वोटिंग कर कह देते थे कि सबका वोट गिर गया।
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