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निर्माण निगम की जांच को लेकर उठ रहे सवाल
Updated Wed, 19 Jul 2017 11:03 PM IST
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बलिया। जिले में स्थित निर्माण निगम में घपले की शिकायतों की जांच को लेकर तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। हैरानी की बात है कि हर महीने कार्यों की समीक्षा के बावजूद विभाग के अधिकारी मनमानी करते रहे।
जिले में हर महीने जिलाधिकारी समेत आला अफसरों की समीक्षा बैठक होती है और विकास कार्यों की समीक्षा की जाती है। बताया जाता है कि बैठक में 50 लाख से अधिक लागत वाले विकास कार्यों की समीक्षा विशेष रुप से की जाती है और इस तरह के बड़े अधिकांश कार्य राजकीय निर्माण निगम के जिम्मे ही है। सवाल उठता है कि आखिर समीक्षा के दौरान विभाग में किए गए गोलमाल कैसे सामने नहीं आ सका जबकि विभाग के इलाहाबाद जोन के महाप्रबंधक की ओर से जांच में जेई लल्लन यादव, तत्कालीन सहायक परियोजना अधिकारी संजय वर्मा समेत पांच को अनियमित तरीके से 13 लाख से अधिक धनराशि के भुगतान के लिए दोषी माना। दूसरी ओर से एक अन्य शिकायत की भी जांच चल रही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या निर्माण निगम के अधिकारी आला अफसरों को तथ्यों को छिपाते हुए जानकारी मुहैया कराते हैं? दर्जनों काम सालों से लंबित होने के बावजूद कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती है? इस तरह के मामले जनपद में एक नहीं बल्कि आधा दर्जन से अधिक हैं, लेकिन प्रशासन की तरफ से उदासीन रुख के चलते इनका हौसला बढ़ा हुआ है।
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जिले में हर महीने जिलाधिकारी समेत आला अफसरों की समीक्षा बैठक होती है और विकास कार्यों की समीक्षा की जाती है। बताया जाता है कि बैठक में 50 लाख से अधिक लागत वाले विकास कार्यों की समीक्षा विशेष रुप से की जाती है और इस तरह के बड़े अधिकांश कार्य राजकीय निर्माण निगम के जिम्मे ही है। सवाल उठता है कि आखिर समीक्षा के दौरान विभाग में किए गए गोलमाल कैसे सामने नहीं आ सका जबकि विभाग के इलाहाबाद जोन के महाप्रबंधक की ओर से जांच में जेई लल्लन यादव, तत्कालीन सहायक परियोजना अधिकारी संजय वर्मा समेत पांच को अनियमित तरीके से 13 लाख से अधिक धनराशि के भुगतान के लिए दोषी माना। दूसरी ओर से एक अन्य शिकायत की भी जांच चल रही है।
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ऐसे में सवाल उठता है कि क्या निर्माण निगम के अधिकारी आला अफसरों को तथ्यों को छिपाते हुए जानकारी मुहैया कराते हैं? दर्जनों काम सालों से लंबित होने के बावजूद कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती है? इस तरह के मामले जनपद में एक नहीं बल्कि आधा दर्जन से अधिक हैं, लेकिन प्रशासन की तरफ से उदासीन रुख के चलते इनका हौसला बढ़ा हुआ है।
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