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उदास मन से गुरुजनाें ने मनाई दिवाली
Ballia
Updated Wed, 14 Nov 2012 12:00 PM IST
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बलिया। जिले में वेतन भुगतान को लेकर महीनों से आंदोलन कर रहे शिक्षक और शिक्षणेतर कर्मचारियों के घर खुशी के मौके पर गम पसरा रहा। बच्चों की जिद्द तक पूरी नहीं हो सकी। पटाखे व मिठाई के लिए भी वह टकटकी लगाए रहे, लेकिन कई जगह बच्चों को पटाखे तक नहीं मिले। शिक्षकों की इस दशा पर किसी को तरस नहीं आया। किसी भी जनप्रतिनिधि ने उनका हाल नहीं जाना और न ही उनको भरोसा दिलाया। शिक्षक व शिक्षणेतर कर्मचारी शासन व प्रशासन की चुप्पी के कारण सरप्लस व नान सरप्लस की चक्की में पिस रहे हैं।
कभी विपक्ष में बैठे सपा नेता शिक्षकों के आंदोलन को धार दिया करते थे, लेकिन जब से सत्ता में आए उन्हें सांप सूंघ गया है। अब शिक्षकों की सुधि लेने का भी उनके पास समय नहीं है। ऐसे में दीपावली जैसे त्योहार पर शिक्षकों के आखों में खुशी की जगह मायूसी ही दिख रही है। कर्मचारी व अधिकारी दीपावली पर जहां अपने बच्चों के साथ खुशियां मना रहे थे, वहीं शासन व प्रशासन की उदासीनता से शिक्षक व शिक्षणेतर कर्मचारियों ने परंपराओं के मुताबिक दीपावली मनाने की सोची, लेकिन मना न सके। शिक्षकों के बच्चे पटाखे व मिठाइयों के के लिए जिद्द करते रहे। शिक्षक नेता सुभाष पांडेय, विष्णुदेव राय, शिवकुमार, अशोक श्रीवास्तव, मुर्तुजा खां, विजय कुमार सिंह आदि ने बताया कि शिक्षक व शिक्षणेतर कर्मचारियों का दर्द शासन व प्रशासन में बैठे लोगों की समझ में नहीं आ रहा है। यदि उनको भी शिक्षकों की तरह ही अभाव में जीना पड़ता तो शिक्षकों का दर्द उन्हें समझ में आता।
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कभी विपक्ष में बैठे सपा नेता शिक्षकों के आंदोलन को धार दिया करते थे, लेकिन जब से सत्ता में आए उन्हें सांप सूंघ गया है। अब शिक्षकों की सुधि लेने का भी उनके पास समय नहीं है। ऐसे में दीपावली जैसे त्योहार पर शिक्षकों के आखों में खुशी की जगह मायूसी ही दिख रही है। कर्मचारी व अधिकारी दीपावली पर जहां अपने बच्चों के साथ खुशियां मना रहे थे, वहीं शासन व प्रशासन की उदासीनता से शिक्षक व शिक्षणेतर कर्मचारियों ने परंपराओं के मुताबिक दीपावली मनाने की सोची, लेकिन मना न सके। शिक्षकों के बच्चे पटाखे व मिठाइयों के के लिए जिद्द करते रहे। शिक्षक नेता सुभाष पांडेय, विष्णुदेव राय, शिवकुमार, अशोक श्रीवास्तव, मुर्तुजा खां, विजय कुमार सिंह आदि ने बताया कि शिक्षक व शिक्षणेतर कर्मचारियों का दर्द शासन व प्रशासन में बैठे लोगों की समझ में नहीं आ रहा है। यदि उनको भी शिक्षकों की तरह ही अभाव में जीना पड़ता तो शिक्षकों का दर्द उन्हें समझ में आता।
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