{"_id":"61913","slug":"Ballia-61913-57","type":"story","status":"publish","title_hn":"करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं मिली त्रासदी से निजात","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं मिली त्रासदी से निजात
Ballia
Updated Mon, 07 May 2012 12:00 PM IST
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बलिया। यहां हर साल गंगा एवं घाघरा की तीव्र लहरें मौत का तांडव करती हैं। बाढ़ व कटान से हजारों की आबादी तहस-नहस हो जाती है, रिहायशी मकान नदी में विलीन हो जाते हैं, सरकारी, गैरसरकारी भवन, ऐतिहासिक स्थल अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। इतना ही नहीं बाढ़ की विभीषिका से हजारों एकड़ फसलें और व्यापक जनहानि होती है। प्रतिवर्ष बाढ़ से बचाव के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन आज तक स्थायी हल नहीं निकल सका है। लोग जख्म गहरा होने से कसक और सुबक रहे हैं। यह कराह टीएस बंधे व बीएसटी बंधे से लगे दर्जनों गांवों में रहने वाले लोगाें की है।
द्वाबा क्षेत्र में बाढ़ से प्रभावित तटीय गांव केहरपुर, गंगौली, श्रीनगर, जगदेवा, टेंगरहीं, शिवपुर, कपूर दियर, बहुआरा व नौरंगा हैं आदि हरसाल डूबता है। जबकि घाघरा नदी दतहां, गोपालपुर, शिवपुर, माझा, नवका गांव, मानगढ़, शिवाल, गोपालनगर, अधिसिजुआ, चांद दियर, यादव नगर, पल्टू नगर, टोला फतेराय आदि गांवों में नदी का कहर टूटता है और सबकुछ बहाकर ले जाती हैं। नदियों की उफनाती लहर से प्रत्येक वर्ष करीब 50 हजार से अधिक की आबादी का जन-जीवन अस्त-व्यस्त एवं उनके अस्तित्व तक पर संकट उत्पन्न होता है। वर्ष 2011 में दर्जनों परिवारों के मवेशी नदी की उफनाती लहरों में समा गए। हजारों बाशिंदों के घरौंदे और उसमें रखे पुस्तैनी संपत्ति नदियों की भेंट चढ़ गई। कृषि योग्य भूमि कुछ कटान की ग्रास बन गई और ज्यादातर फसल बाढ़ के पानी में डूबकर नष्ट हो गई। तहसील प्रशासन की ओर से प्रतिवर्ष बाढ़ पर राहत के नाम पर लाखों व करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन इससे निजात के लिए कोई पहल नहीं होती। लोगों का कहना है कि अगर पक्के तटबंध का निर्माण हो तो एक साथ दो-दो समस्याओं से लोगों को निजात मिल सकती है। लेकिन इस दिशा में अभी तक शासन-प्रशासन स्तर से पहल नहीं की गई है।
द्वाबा की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि दोनों तरफ से गंगा एवं घाघरा नदियों घेरती हैं। बाढ़ में सबकुछ तहस-नहस हो जाने की वजह से पीड़ित घास-फूस से निर्मित मड़हों में निवास करते हैं और आग की एक चिन्गारी गांव के गांव को बर्बाद कर जाती है।
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पिछले बाढ़ में क्षति एवं तहसील प्रशासन की ओर से राहत के नाम पर दिये जाने वाले धन पर गौर करें तो 25 लाख से अधिक की फसल, लाखों की रिहायशी मकान के नदियों की गोद में समाने के साथ ही 14 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। असमय मौत की गोद में समा जाने वाले मृतकों में बाढ़ के बाद संक्रमित बीमारियों आदि के लोग शामिल हैं। बाढ़ में तीन दर्जन से अधिक मवेशी बह गए थे। तहसील प्रशासन की ओर से राहत के नाम पर 21 लाख 87 हजार 710 रुपये खर्च किए गए। इसमें केवल साढ़े पांच लाख रुपये वोट किराया खर्च किया गया। पिछले चार वर्षों के तहत वर्ष 2007-08 में 18 लाख, 2008-09 में 18 लाख 53 हजार, 2009-10 में 19 लाख 26 हजार व 2010-11 में करीब 21 लाख रुपये सरकारी राहत के नाम पर खर्च किये गए। प्रबुद्ध एवं क्षेत्रीय बाशिंदों का मानना है कि दृढ़ इच्छाशक्ति एवं वास्तव में इस त्रासदी से निजात दिलानी है तो शासन-प्रशासन को पक्का तटबंध का निर्माण करवाना ही होगा। अनदेखी की अवस्था में तबाही का मंजर बरकरार रहेगी। तटबंध निर्माण के बारे में क्षेत्रीय विधायक जयप्रकाश अंचल का कहना है कि सिंचाई व निर्माण विभाग को पत्र लिखा गया है।
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द्वाबा क्षेत्र में बाढ़ से प्रभावित तटीय गांव केहरपुर, गंगौली, श्रीनगर, जगदेवा, टेंगरहीं, शिवपुर, कपूर दियर, बहुआरा व नौरंगा हैं आदि हरसाल डूबता है। जबकि घाघरा नदी दतहां, गोपालपुर, शिवपुर, माझा, नवका गांव, मानगढ़, शिवाल, गोपालनगर, अधिसिजुआ, चांद दियर, यादव नगर, पल्टू नगर, टोला फतेराय आदि गांवों में नदी का कहर टूटता है और सबकुछ बहाकर ले जाती हैं। नदियों की उफनाती लहर से प्रत्येक वर्ष करीब 50 हजार से अधिक की आबादी का जन-जीवन अस्त-व्यस्त एवं उनके अस्तित्व तक पर संकट उत्पन्न होता है। वर्ष 2011 में दर्जनों परिवारों के मवेशी नदी की उफनाती लहरों में समा गए। हजारों बाशिंदों के घरौंदे और उसमें रखे पुस्तैनी संपत्ति नदियों की भेंट चढ़ गई। कृषि योग्य भूमि कुछ कटान की ग्रास बन गई और ज्यादातर फसल बाढ़ के पानी में डूबकर नष्ट हो गई। तहसील प्रशासन की ओर से प्रतिवर्ष बाढ़ पर राहत के नाम पर लाखों व करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन इससे निजात के लिए कोई पहल नहीं होती। लोगों का कहना है कि अगर पक्के तटबंध का निर्माण हो तो एक साथ दो-दो समस्याओं से लोगों को निजात मिल सकती है। लेकिन इस दिशा में अभी तक शासन-प्रशासन स्तर से पहल नहीं की गई है।
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द्वाबा की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि दोनों तरफ से गंगा एवं घाघरा नदियों घेरती हैं। बाढ़ में सबकुछ तहस-नहस हो जाने की वजह से पीड़ित घास-फूस से निर्मित मड़हों में निवास करते हैं और आग की एक चिन्गारी गांव के गांव को बर्बाद कर जाती है।
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पिछले बाढ़ में क्षति एवं तहसील प्रशासन की ओर से राहत के नाम पर दिये जाने वाले धन पर गौर करें तो 25 लाख से अधिक की फसल, लाखों की रिहायशी मकान के नदियों की गोद में समाने के साथ ही 14 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। असमय मौत की गोद में समा जाने वाले मृतकों में बाढ़ के बाद संक्रमित बीमारियों आदि के लोग शामिल हैं। बाढ़ में तीन दर्जन से अधिक मवेशी बह गए थे। तहसील प्रशासन की ओर से राहत के नाम पर 21 लाख 87 हजार 710 रुपये खर्च किए गए। इसमें केवल साढ़े पांच लाख रुपये वोट किराया खर्च किया गया। पिछले चार वर्षों के तहत वर्ष 2007-08 में 18 लाख, 2008-09 में 18 लाख 53 हजार, 2009-10 में 19 लाख 26 हजार व 2010-11 में करीब 21 लाख रुपये सरकारी राहत के नाम पर खर्च किये गए। प्रबुद्ध एवं क्षेत्रीय बाशिंदों का मानना है कि दृढ़ इच्छाशक्ति एवं वास्तव में इस त्रासदी से निजात दिलानी है तो शासन-प्रशासन को पक्का तटबंध का निर्माण करवाना ही होगा। अनदेखी की अवस्था में तबाही का मंजर बरकरार रहेगी। तटबंध निर्माण के बारे में क्षेत्रीय विधायक जयप्रकाश अंचल का कहना है कि सिंचाई व निर्माण विभाग को पत्र लिखा गया है।