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परमपिता की आराधना ही जीवन की सार्थकता
Ballia
Updated Wed, 02 May 2012 12:00 PM IST
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गड़वार। क्षेत्र के बंधु बाबा धाम विशुकिया (पुरा) पर पिछले एक पखवारे से चल रहे राधा-कृष्ण प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और लक्ष्मी नारायन यज्ञ का समापन सोमवार को विशाल भंडारे के साथ हो गया। इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया।
सोमवार को भक्तों ने वृंदावन से पधारे बाल योगी कृष्णानंद वेदांती जी महाराज ने अपने मुखारबिंद से भक्तों को प्रवचन का रसास्वादन किया। कार्यक्रम के समापन पर योगी वेदांती ने कहा कि मनुष्य के कई जन्मों के रूप में जब परिवर्तन होता है तब जाकर जगत में जीवन-यापन करते समय ही जगदीश्वर के सुखद लीला का साथ मिलता है। इस घोर कलियुग में भी सरल, सुलभ ऐसा कोई दिन नहीं जिस दिन हमें सत्कर्म करने का सुंदर, सुखद, सानिध्य न मिले।
अत: हम सभी को उस परमपिता की आराधना को ही जीवन की सार्थकता एवं पूंजी मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि मिट्टी से मिट्टी लिखना तो आसान है लेकिन रिश्ते निभा पाना बड़ा ही कठिन कार्य है। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से पानी से पानी लिखना मुश्किल और दुरूह कार्य है उसी प्रकार परमात्मा से रिश्ते निभा पाना भी कठिन कार्य है।
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इसलिए हम प्रभु से चाहे जो कोई भी एक रिश्ता जोड़ लें, माता, पिता, बंधु, सखा-स्वामी के रूप में हमारे संबंध बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे करने पर उस विधाता से निभाना आ जाएगा और उसकी यादें रिश्ता बन जाएंगी। यही याद आगे चलकर दया का कारण बन जाता है। उन्होंने कहा कि प्रभु को सच्चे मन से याद कर लो तो वह दया करेगा। उसे पुकारो तो वो आपके पास दौड़ा चला आएगा। यज्ञ के मुख्य यजमान दूधनाथ यादव, स्वामी नाथ, यदुनाथ, पारस नाथ यादव, स्वामी नाथ, राम सिंहासन यादव, राम नगीना, सुनील यादव आदि रहे।
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सोमवार को भक्तों ने वृंदावन से पधारे बाल योगी कृष्णानंद वेदांती जी महाराज ने अपने मुखारबिंद से भक्तों को प्रवचन का रसास्वादन किया। कार्यक्रम के समापन पर योगी वेदांती ने कहा कि मनुष्य के कई जन्मों के रूप में जब परिवर्तन होता है तब जाकर जगत में जीवन-यापन करते समय ही जगदीश्वर के सुखद लीला का साथ मिलता है। इस घोर कलियुग में भी सरल, सुलभ ऐसा कोई दिन नहीं जिस दिन हमें सत्कर्म करने का सुंदर, सुखद, सानिध्य न मिले।
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अत: हम सभी को उस परमपिता की आराधना को ही जीवन की सार्थकता एवं पूंजी मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि मिट्टी से मिट्टी लिखना तो आसान है लेकिन रिश्ते निभा पाना बड़ा ही कठिन कार्य है। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से पानी से पानी लिखना मुश्किल और दुरूह कार्य है उसी प्रकार परमात्मा से रिश्ते निभा पाना भी कठिन कार्य है।
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इसलिए हम प्रभु से चाहे जो कोई भी एक रिश्ता जोड़ लें, माता, पिता, बंधु, सखा-स्वामी के रूप में हमारे संबंध बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे करने पर उस विधाता से निभाना आ जाएगा और उसकी यादें रिश्ता बन जाएंगी। यही याद आगे चलकर दया का कारण बन जाता है। उन्होंने कहा कि प्रभु को सच्चे मन से याद कर लो तो वह दया करेगा। उसे पुकारो तो वो आपके पास दौड़ा चला आएगा। यज्ञ के मुख्य यजमान दूधनाथ यादव, स्वामी नाथ, यदुनाथ, पारस नाथ यादव, स्वामी नाथ, राम सिंहासन यादव, राम नगीना, सुनील यादव आदि रहे।