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क्रांतिकारियों ने लूटी तिजोरी, तोड़कर नोटों को जलाया-
Updated Tue, 14 Aug 2018 12:32 AM IST
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बलिया। सन 1942 की क्रांति का असर जिले में आजादी के दीवानों के सिर चढ़कर बोलने लगा था। जनपद के चप्पे-चप्पे पर आंदोलन का क्रम जारी था। चितबड़ागांव में भोज दत्त यादव और माधव सिंह बरजहिया की अगुवाई में लोगों ने डाकघर पर धावा बोल दिया और सभी अभिलेख और रोकड़ पर अधिकार कर लिया। आंदोलनकारियों ने स्वायत सरकार की स्थापना कर डाकघर के संचालन के लिए जगन्नाथ तिवारी को आजाद भारत का डाकपाल बना दिया। उधर, सोहांव सेरामनगीना राय सैकड़ों युवाओं के साथ चितबड़ागांव पहुंचे। इन लोगों ने चितबड़ागांव, ताजपुर और फेफना सहित आसपास के गांव के लोगों के सहयोग से पूरी रात रेलवे के सिग्नल, टेलीफोन लाइनों को तहस-नहस करने का काम किया। इलाहाबाद, वाराणसी में पढ़ने वाले छात्रों ने एक ट्रेन पर ही कब्जा कर लिया और उसका नाम आजाद हिंद ट्रेन घोषित करते हुए रवाना हुए। यह ट्रेन सुबह करीब आठ बजे बेल्थरारोड रेलवे स्टेशन पर पहुंची। एक क्रांतिकारी छात्रा ने ललकारा कि अंग्रेजों का राज खत्म हो गया है। छात्रा के शब्दों ने छात्रनेता पारसनाथ मिश्र को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने डीएवी के छात्रों को साथ लेकर जुलूस निकाला और रेलवे स्टेशन, डाकघर, मालगोदाम को फूंक दिया। इसी बीच एक मालगाड़ी रलवे स्टेशन पर पहुंची तो उसे भी आग के हवाले कर दिया गया। मालगाड़ी पर लदी चीनी को क्रांतिकारियों ने लूट लिया और मालगाड़ी पर लदी तिजोरी से नोटों को निकाल कर फूंक दिया। इसमें डीएवी कालेज के प्रधानाचार्य देवनाथ उपाध्याय, डा. हरचरण लाल, सरजू राम, सुदेश्वर लाल, ऋषि तिवारी, चंद्रदीपसिंह, चंद्रमा यादव, जगन्नाथ पांडेय, प्यारेमोहन लाल, वासुदेव सिंह, माधव सिंह, लालजी दुबे, श्रीकांत आदि भी शामिल थे। उधर, सिकंदरपुर में चेतन किशोर निवासी राम नगीना राय छोटे स्कूली बच्चों के जुलूस के साथ मिडिल स्कूल पहुंचे। बच्चे तिरंगा लहरा रहे थे और आजादी के गीत गा रहे थे। मिडिल स्कूल से जब जुलूस कस्बा की ओर से चला तो थानेदार अशफाक ने जुलूस पर घोड़ा दौड़ा दिया, जिससे दर्जनों बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए। इसी बीच राम नगीना राय को गिरफ्तार कर लिया गया।
आए दिन होती थी झड़प, कई बार अंग्रेज सिपाहियों को भगाया
बलिया। जिले का कोई ऐसा गांव नहीं था जहां आंदोलन की आग नहीं सुलग रही थी। ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए लोग तरह-तरह से विरोध जताने का काम करते थे। नरहीं थाना के छप्पन के डेरा गांव निवासी 69 वर्षीय रमाशंकर यादव अपने पिता विश्वनाथ यादव की बातों को याद करते हुए बताते हैं कि गांवों में नरम और गरम दल था लेकिन दोनों में सामंजस्य अच्छा रहता था। 1942 के आंदोलन में यहां के लोग भी नरहीं गांव के लोगों के सहयोग में लाठी-डंडा लेकर तैयार रहते थे। नरहीं गांव सड़क के किनारे था और अक्सर सिपाहियों से झड़प होती थी। आंदोलन को दबाने के लिए जब भी सिपाही नरहीं के लोगों को पकड़ने का प्रयास करते थे गांव के लोग जबर्दस्त विरोध करते और बुलावा आने पर इस गांव के लोग भी लाठी लेकर चल पड़ते थे। कई बार अंग्रेज सिपाहियों को भागने के लिए मजबूर कर दिया गया।
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आए दिन होती थी झड़प, कई बार अंग्रेज सिपाहियों को भगाया
बलिया। जिले का कोई ऐसा गांव नहीं था जहां आंदोलन की आग नहीं सुलग रही थी। ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए लोग तरह-तरह से विरोध जताने का काम करते थे। नरहीं थाना के छप्पन के डेरा गांव निवासी 69 वर्षीय रमाशंकर यादव अपने पिता विश्वनाथ यादव की बातों को याद करते हुए बताते हैं कि गांवों में नरम और गरम दल था लेकिन दोनों में सामंजस्य अच्छा रहता था। 1942 के आंदोलन में यहां के लोग भी नरहीं गांव के लोगों के सहयोग में लाठी-डंडा लेकर तैयार रहते थे। नरहीं गांव सड़क के किनारे था और अक्सर सिपाहियों से झड़प होती थी। आंदोलन को दबाने के लिए जब भी सिपाही नरहीं के लोगों को पकड़ने का प्रयास करते थे गांव के लोग जबर्दस्त विरोध करते और बुलावा आने पर इस गांव के लोग भी लाठी लेकर चल पड़ते थे। कई बार अंग्रेज सिपाहियों को भागने के लिए मजबूर कर दिया गया।
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