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बलिया समेत पूर्वांचल में बौद्घ पर्यटन का विकास जरूरी
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बलिया। लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले भारी जनसमर्थन के बाद अब लोगों की भाजपा से काफी उम्मीदें हैं। सारनाथ, बलिया, कुशीनगर, लुंबिनी से नालंदा बोधगया के बीच बौद्ध परिपथ बनाने के साथ ही पूर्वांचल में बौद्ध पर्यटन के विकास को लोगों ने आवश्यक बताया है।
विगत बीस वर्षों में उत्तरप्रदेश के सारनाथ से लेकर कुशीनगर, गोरखपुर से लुंबिनी ( नेपाल ) एवं वाराणसी से बोध गया वाया सासाराम रोड पर बौद्ध परिपथ का बोर्ड तो लगा दिया गया है लेकिन इन मार्गों पर पर्यटन विकास की मौलिक सुविधाएं नहीं हैं।
पुरातात्विक सांस्कृतिक विरासतों के शोधकर्ता व साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि बलिया जिले में स्थित भृगुआश्रम में भगवान बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व योग साधना की थी। इसका उल्लेख डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने अपनी पुस्तक द बुद्धा एंड दिस धम्मा में भी किया है। बोधगया से सारनाथ जाते समय अर्हत बुद्ध का सामना नरभक्षी मानवों के साथ बलिया जिले के अमावं गांव में हुआ था। यहां पर सम्राट अशोक के द्वारा स्तंभ की स्थापना की गयी थी। इसका उल्लेख चीनी यात्रियों फाह्यान एवं ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में बौद्ध विहार होने का वर्णन किया है। इसके साथ ही इतिहासकारों मि.फासवेल के चाइनीज अकाउंट्स आफ इंडिया और डॉ. ओल्डहम मेम्वायर्स की पुस्तकों में भी इसका उल्लेख मिलता है।
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कहा कि विश्व के लगभग पचास देशों में बौद्ध धम्म के अनुयायी रहते हैं जो इन स्थानों के दर्शन करने आते हैं लेकिन भारत सरकार ने इन स्थानों पर पहुंचने के सुगम मार्गों तथा पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया। कौशिकेय ने कहा कि पूर्वांचल को विकास के पथ पर दौड़ाने लिए उत्तरप्रदेश के सारनाथ , बलिया, कुशीनगर, लुंबिनी ( नेपाल ) बिहार के नालंदा, बोधगया, राजगीर को एक वृत्ताकार संकुल में बौद्ध परिपथ सड़कों को बना कर इन स्थानों के लिये बसों का संचालन करना होगा। इन स्थानों पर पर्यटन विकास की मौलिक सुविधाएं उपलब्ध करानी होगी। यह विकास का एक ऐसा स्थायी समाधान है जिसका लाभ इससे जुड़े सभी लोगों को मिलेगा।
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विगत बीस वर्षों में उत्तरप्रदेश के सारनाथ से लेकर कुशीनगर, गोरखपुर से लुंबिनी ( नेपाल ) एवं वाराणसी से बोध गया वाया सासाराम रोड पर बौद्ध परिपथ का बोर्ड तो लगा दिया गया है लेकिन इन मार्गों पर पर्यटन विकास की मौलिक सुविधाएं नहीं हैं।
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पुरातात्विक सांस्कृतिक विरासतों के शोधकर्ता व साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने बताया कि बलिया जिले में स्थित भृगुआश्रम में भगवान बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व योग साधना की थी। इसका उल्लेख डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने अपनी पुस्तक द बुद्धा एंड दिस धम्मा में भी किया है। बोधगया से सारनाथ जाते समय अर्हत बुद्ध का सामना नरभक्षी मानवों के साथ बलिया जिले के अमावं गांव में हुआ था। यहां पर सम्राट अशोक के द्वारा स्तंभ की स्थापना की गयी थी। इसका उल्लेख चीनी यात्रियों फाह्यान एवं ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में बौद्ध विहार होने का वर्णन किया है। इसके साथ ही इतिहासकारों मि.फासवेल के चाइनीज अकाउंट्स आफ इंडिया और डॉ. ओल्डहम मेम्वायर्स की पुस्तकों में भी इसका उल्लेख मिलता है।
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कहा कि विश्व के लगभग पचास देशों में बौद्ध धम्म के अनुयायी रहते हैं जो इन स्थानों के दर्शन करने आते हैं लेकिन भारत सरकार ने इन स्थानों पर पहुंचने के सुगम मार्गों तथा पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया। कौशिकेय ने कहा कि पूर्वांचल को विकास के पथ पर दौड़ाने लिए उत्तरप्रदेश के सारनाथ , बलिया, कुशीनगर, लुंबिनी ( नेपाल ) बिहार के नालंदा, बोधगया, राजगीर को एक वृत्ताकार संकुल में बौद्ध परिपथ सड़कों को बना कर इन स्थानों के लिये बसों का संचालन करना होगा। इन स्थानों पर पर्यटन विकास की मौलिक सुविधाएं उपलब्ध करानी होगी। यह विकास का एक ऐसा स्थायी समाधान है जिसका लाभ इससे जुड़े सभी लोगों को मिलेगा।