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गांव में अब नहीं दिखती बहंगी,
Updated Sat, 13 Jan 2018 10:49 PM IST
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जयप्रकाशनगर। अन्य त्योहारों की तरह यह मकर संक्रांति का त्योहार नहीं है। यह त्योहार दो हित-कुटुमों के बीच के प्रेम को भी बखूबी दर्शाता है। गांव हो या शहर इस त्योहार पर एक प्रथा लंबे समय से चली आ रही है। वह है विवाहित बिटिया या बहू को तिलवा(लाई) यानि संक्रांति भेजने की प्रथा। अब किसी गांव में शायद ही यह प्रथा कहीं दिख जाए। आज से डेढ़ दशक पहले तक गांवों में दूर-दराज से बड़े-बड़े दउड़ा में तिलवा(लाई) व अन्य सामग्री लेकर आते-जाते असंख्य लोग दिख जाते थे। तब की स्थिति में गांवों में तो लोग, मजदूर के दउड़ा लिए देख, बिन बताए भी जान जाते थे, कि फलां के यहां उनके कुटुम के यहां से तिलवा, यानि सक्रांति पहुंच चुकी है। वहीं जिनके घर यह संक्रांति पहुंचती थी, उन्हें भी इसे बायन(भेंट) रूप में अपने नजदीकी लोगों में बांटना होता था। नहीं बांटने की स्थिति में लोग उनसे नाराज भी हो जाते थे, और अगले दिन इस बात की शिकायत भी प्रत्यक्ष रूप से करते थे।
अब वह नजारा लगभग गांवों से गायब है। इसे संबंधों की दूरियां कहें या आधुनिक मानसिकता, अब उसके स्थान पर मोबाईल पर हाय-हेलो के साथ कुछ संदेश एक-दूसरे को सोशल साइट्स के माध्यम से भेज दिया जाता है, और इसी के साथ, हर त्योहार पर एक-दूसरे के लिए मंगल कामना कर ली जाती है। सिताबदियारा निवासी गांव के बुजुर्ग शिक्षक योगेंद्र सिंह मानते हैं कि इससे लाख दुना अच्छा था, तब का समाज, जब संचार माध्यमों का आभाव था। बताया कि हमें याद है वह दिन भी, जब बहू भी मकर सक्रांति पर यदि किसी कारण अपने मायके में होती थी, तो उसके ससुराल से भी उसे मायका में ही सक्रांति भेजा जाता था। वहीं यदि बहू अपने ससुराल में होती थी, तो उसके मायके से यह रश्म निभाया जाता था। इस मौके पर बेटी-बहू को चुड़ा-गुड़, तिलवा(लाई) वस्त्र, तिलकुट, मिष्ठान आदि को हर हाल में भेजा जाता था।
बिटिया या बहू को भी यह इंतजार रहता था, कि इस मौके पर जरूर कोई उसका अपना, उसके यहां पहुंचेगा, जिससे वह जी भर अपनत्व की भाषा में बातें कर सकेगी, किंतु दुखद की अब परिवार की परिभाषा ही बदलती जा रही है। कहा कि अब महिलाओं की विचारधारा भी लगभग बदल सी गई है। अब उन्हें भी न इस बात का मलाल है, और न ही इंतजार। बस मोबाइल से कुशल-छेम पूछ कर ही इस परंपरा का निर्वाह होने लगा है। गांवों न बहंगी नजर आ रही, न दूर-दराज के बड़े दउड़ा सिर पर लिए वह मजदूर। अब एक तरह से रिश्ते नाते सबकुछ, तेज गति से बदल रहे हैं। अपनत्व की भावना में कमी आ रही है। अधिकांश परिवार एकांकी दिशा में सफर कर रहे हैं, जबकि 40 फीसदी पुराने लोग, आज भी उस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।
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अब वह नजारा लगभग गांवों से गायब है। इसे संबंधों की दूरियां कहें या आधुनिक मानसिकता, अब उसके स्थान पर मोबाईल पर हाय-हेलो के साथ कुछ संदेश एक-दूसरे को सोशल साइट्स के माध्यम से भेज दिया जाता है, और इसी के साथ, हर त्योहार पर एक-दूसरे के लिए मंगल कामना कर ली जाती है। सिताबदियारा निवासी गांव के बुजुर्ग शिक्षक योगेंद्र सिंह मानते हैं कि इससे लाख दुना अच्छा था, तब का समाज, जब संचार माध्यमों का आभाव था। बताया कि हमें याद है वह दिन भी, जब बहू भी मकर सक्रांति पर यदि किसी कारण अपने मायके में होती थी, तो उसके ससुराल से भी उसे मायका में ही सक्रांति भेजा जाता था। वहीं यदि बहू अपने ससुराल में होती थी, तो उसके मायके से यह रश्म निभाया जाता था। इस मौके पर बेटी-बहू को चुड़ा-गुड़, तिलवा(लाई) वस्त्र, तिलकुट, मिष्ठान आदि को हर हाल में भेजा जाता था।
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बिटिया या बहू को भी यह इंतजार रहता था, कि इस मौके पर जरूर कोई उसका अपना, उसके यहां पहुंचेगा, जिससे वह जी भर अपनत्व की भाषा में बातें कर सकेगी, किंतु दुखद की अब परिवार की परिभाषा ही बदलती जा रही है। कहा कि अब महिलाओं की विचारधारा भी लगभग बदल सी गई है। अब उन्हें भी न इस बात का मलाल है, और न ही इंतजार। बस मोबाइल से कुशल-छेम पूछ कर ही इस परंपरा का निर्वाह होने लगा है। गांवों न बहंगी नजर आ रही, न दूर-दराज के बड़े दउड़ा सिर पर लिए वह मजदूर। अब एक तरह से रिश्ते नाते सबकुछ, तेज गति से बदल रहे हैं। अपनत्व की भावना में कमी आ रही है। अधिकांश परिवार एकांकी दिशा में सफर कर रहे हैं, जबकि 40 फीसदी पुराने लोग, आज भी उस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।
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