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पहले के ददरी मेला में आती थी आंवला और नीबू की दूकानें
Updated Sun, 12 Nov 2017 11:42 PM IST
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बलिया। ददरी मेला में आंवला और नीबू खरीदने की पुरानी परंपरा रही है। करीब दो दशक पहले तक लोग ददरी मेले का इंतजार करते थे कि मेले में ही आंवला और नीबू खरीदकार अचार और मुरब्बा तैयार करेंगे। लेकिन दिनों दिन यह पुरानी परंपरा लुप्त होती जा रही है। आलम यह है कि मेले में एक दो दूकानें ही आंवला और नीबू की लग रही है। इस बार भी ददरी मेला में दो तीन दूकानें ही आंवले की लगी हुई है।
कार्तिक पूर्णिमा से लगने वाले ददरी मेला में लोग आंवला के प्राकृतिक गुणों को देखते हुए खरीदारी करते थे। जिसे ले जाकर अपने घर मुरब्बा और आचार बनाते थे। जो पूरे साल चलता था। वहीं मेले में खरीदे गए नीबू भी पूरे साल आचार के लिए प्रयोग किया जाता था। दिनों दिन मेले में यह पुरानी परंपरा वाली दूकानें समाप्त होती जा रही है। दूकानदार रमाकांत ने बताया कि मेले में करीब दो-तीन दशक से आ रहा है। अब मेले में कम दूकाने आने से बिक्री भी पहले की तरह से नहीं रह गई है। वहीं आंवले और नीबू पर भी महंगाई का असर पड़ा है।
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कार्तिक पूर्णिमा से लगने वाले ददरी मेला में लोग आंवला के प्राकृतिक गुणों को देखते हुए खरीदारी करते थे। जिसे ले जाकर अपने घर मुरब्बा और आचार बनाते थे। जो पूरे साल चलता था। वहीं मेले में खरीदे गए नीबू भी पूरे साल आचार के लिए प्रयोग किया जाता था। दिनों दिन मेले में यह पुरानी परंपरा वाली दूकानें समाप्त होती जा रही है। दूकानदार रमाकांत ने बताया कि मेले में करीब दो-तीन दशक से आ रहा है। अब मेले में कम दूकाने आने से बिक्री भी पहले की तरह से नहीं रह गई है। वहीं आंवले और नीबू पर भी महंगाई का असर पड़ा है।
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