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पश्चिम बंगाल व बंगलूरू तक फैली है बहराइच के रेशम की चमक

Mon, 02 Mar 2020 10:48 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 02 Mar 2020 10:48 PM IST
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The shine of Bahraich's silk extends to West Bengal and Bangalore
बहराइच में रेशम विभाग परिसर में रेशम के कीट को देखते अधिकारी। - फोटो : BAHRAICH
बहराइच। बहराइच के रेशम की चमक पश्चिम बंगाल और बंगलूरू तक फैली हुई है। बनारस, बांदा, आजमगढ़, गोरखपुर व पीलीभीत तक भी बहराइच के रेशम की आपूर्ति की जाती है। जिले के 5200 किसान रेशम उत्पादन के रोजगार से जुड़े हैं। प्रति वर्ष करीब दो लाख किलोग्राम रेशम दूसरे जिलों को भेजा जाता है। जहां उससे रेशम के कपड़े बनाए जाते हैं।
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बहराइच में रेशम उद्योग को ग्रामीण अंचलों में कुटीर उद्योगों के रूप में पहचान मिल रही है। जिले के चित्तौरा विकास खंड में कल्पीपारा कैमीचक और नगरौर में राजकीय रेशम फार्म बने हुए हैं, जबकि विकास खंड तेजवापुर के गजपतिपुर, महसी के रेहुआ मंसूर, मिहीपुरवा के महादेवा व गोपिया और बलहा के बगहा में भी रेशम के केंद्र बने हुए हैँ। रेशम का उत्पादन करने में जिले के 5200 किसान जुड़े हुए हैं। रेशम के उत्पादन के लिए इन किसानों को शहतूत की नर्सरी दी जाती है।
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सहायक निदेशक रेशम एसबी सिंह ने बताया कि एक एकड़ में किसान 20 से 25 हजार रुपये में रेशम कोया उत्पादन का कारोबार शुरू कर सकते हैं। एक एकड़ में एक साल में करीब 500 किलोग्राम कोये का उत्पादन होता है। उप निदेशक ने बताया कि अभी तक जिले में 1.84 लाख कोये का उत्पादन किया जा चुका है। इस बार दो लाख किलोग्राम कोये के उत्पादन की संभावना है। बाहर के व्यापारी बहराइच के कोये से रेशम की उत्पादन को पहली पसंद मानते हैं। जिसके चलते किसानों को एक एकड़ में करीब एक लाख रुपये की आय भी हो जाती है। बनारस, बांदा, आजमगढ़, गोरखपुर व पीलीभीत के साथ ही बंगलूरू और पश्चिम बंगाल के व्यापारी बहराइच में रेशम के कोये की खरीददारी के लिए आते हैं। किसानों को अपना माल बेचने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं होती है।
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दिया जा रहा प्रशिक्षण
सहायक निदेशक रेशम ने बताया कि किसानों को अधिक से अधिक संख्या में जोड़ने के लिए उन्हें जागरूक किया जा रहा है। नए कोया उत्पादकों को प्रदेश के बाहर तीन दिवसीय प्रशिक्षण के लिए भी भेजा जाता है। जिससे वह तकनीकी जानकारियों के साथ उत्पादन बढ़ाने में सहयोग कर सके।

छह महीने में तैयार होता है पेड़
सहायक निदेशक रेशम ने बताया कि शहतूत का पेड़ तैयार होने में छह महीने का समय लगता है। छह महीने के अंदर 25 से 28 डिग्री. के तापमान पर कीट पालने का काम किया ाता है। रेशम का कीट अधिक गर्मी, ठंडक व बरसात को सहन नहीं कर सकता। ऐसे में कीट को पालने में सबसे अधिक सावधानी बरतने की जरूरत रहती है।
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