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घुंघरुओं सी खनखनाहट बिखेर रहे पेंगोलिन

Sat, 06 Feb 2016 10:15 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच Updated Sat, 06 Feb 2016 10:15 PM IST
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pengolin in katarniyaghat
बहराइच/मिहींपुरवा। किसी वन्यजीव के चलने पर पायलों जैसी रुनझुन और घुंघरुओं सी खनखनाहट की आवाज सुनाई पड़े तो अचंभा होगा।
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लेकिन, हैरत में न पड़िये, कतर्नियाघाट में पाया जाने वाला दुर्लभ पेंगोलिन जब शिकार पर निकलता है तो ऐसी ही आवाज सुनाई पड़ती है।

यह दुर्लभ जीव कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के शुष्क इलाकों में पाया जाता है। दो दिन पूर्व कैमरा ट्रैपिंग के दौरान पेंगोलिन कैमरे में कैद हुआ। पेंगोलिन की शिकारियों को भी तलाश रहती है। वहीं, खतरा भांपकर पेंगोलिन गेंद के आकार का बन जाता है।

कतर्नियाघाट के ककहरा रेंज में स्थापित थर्मो सेंसर कैमरे में दो दिन पूर्व दुर्लभ पेंगोलिन (सल्लू सांप) की तस्वीरें कैद हुईं तो वनाधिकारी भी हैरत में पड़ गए।
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तस्वीरों के साथ ऑडियो में पेंगोलिन के चलने पर खनखनाहट की आवाज सुनाई पड़ रही थी। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के डीएफओ आशीष तिवारी ने बताया कि पेंगोलिन को छिपकली प्रजाति का माना जाता है।
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हालांकि, बोलचाल की भाषा में इसे सल्लू सांप भी कहा जाता है। पेंगोलिन जमीन में साढ़े तीन से चार मीटर अंदर बिल बनाकर रहता है। चींटी और दीमक इसके आहार हैं।

तिवारी ने बताया कि पेंगोलिन की त्वचा पर काफी कठोर शल्क इसके कवच का काम करते हैं और चलने पर पायलों के रुनझुन और सिक्कों के खनखनाहट की आवाज सुनाई पड़ती है।

उन्होंने बताया कि पेंगोलिन काफी शर्मीला और डरपोक होता है। शिकार की आहट पर अपनी सुरक्षा के लिए यह गेंद का आकार ले लेता है। बाघ या तेंदुए के अलावा अन्य वन्यजीव इसका शिकार नहीं कर सकते।

काफी कम है संख्या

पेंगोलिन की संख्या देश में काफी कम है। कतर्नियाघाट में अनुमान के मुताबिक संख्या 250 से तीन सौ के आसपास ही होगी। इनका रंग भूरा और मटमैला तथा पीला भी होता है। शरीर का शल्कमुक्त भाग सफेद, भूरा और कालापन लिए होता है।

बनती है दवा और जैकेट

पैंगोलिन को शिकारियों से खतरा है। इनकी त्वचा और शल्क के साथ मांस की भी तस्करी होती है। खाड़ी और पश्चिमी देशों में शल्क से जैकेट व मांस से कामोत्तेजक दवाएं बनाई जाती हैं। शल्क की अंगूठी को तैयार कर उसे पाइल्स रोगियों को पहनाया जाता है।


पाई जाती हैं दो प्रजातियां

कतर्नियाघाट में पेंगोलिन की भारतीय और चायनीज, दो प्रजातियां पाई जाती हैं। भारतीय प्रजाति के पेंगोलिन का आकार 30 से 100 सेंटीमीटर और चायनीज25 से 75 सेंटीमीटर का होता है। पेंगोलिन अपनी जुबान से शिकार करते हैं, इनके दांत नहीं होते। इनकी जुबान 40 सेंटीमीटर तक फैल सकती है।
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