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श्रावस्ती में बढ़ी गिद्धों की संख्या
अमर उजाला/श्रावस्ती
Updated Sun, 30 Apr 2017 10:49 PM IST
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श्रावस्ती में दिखे गिद्ध
- फोटो : अमर उजाला
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पर्यावरण से सरोकार रखने वालों के लिए अच्छी खबर है कि तराई में लुप्त हो चुके गिद्धों ने जीवन की जंग जीत ली है। डाइक्लोफेनिक जैसी दवाओं की मारक क्षमता को मात देकर गिद्ध अब फिर से इस आबोहवा में लौटने लगे हैं। भिनगा के आसपास गिद्धों की अच्छी खासी तादाद देखने को मिल रही है। खासतौर पर लक्ष्मननगर गिलौला रोड व सिरसिया क्षेत्र में। जंगल से जुड़े विशेषज्ञ इसे पर्यावरण के लिए शुभ संकेत मान रहे हैं।
लगभग बीस वर्ष पूर्व सिरसिया में जंगल से सटे इलाके के साथ जमुनहा व गिलौला क्षेत्र में हर जगह गिद्धों के बड़े झुण्ड दिख जाते थे। हर झुण्ड में चालीस से पचास गिद्धों की मौजूदगी आम बात होती थी।
धीरे-धीरे गिद्ध तराई से गायब होने लगे। अचानक गिद्धों के गायब होने के कारण पर्यावरण प्रेमियों व वन विभाग को भी चिंता सताने लगी थी। अब एक बार फिर से क्षेत्र में गिद्धों के दिखने से पर्यावरण प्रेमियों के साथ ही वन विभाग के लिए खुशखबरी है। रविवार को गिलौला क्षेत्र के दुर्गापुर में ऐसे ही गिद्धों के एक विशाल झुण्ड को देखा गया। सिरसिया के बघौड़ा रोड पर कई स्थानों पर गिद्ध दस से पंद्रह के झुण्ड में दिखाई दे रहे हैं।
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बॉम्बे नेचुरल सोसायटी के शोध के मुताबिक कभी देश में गिद्धों की संख्या चार करोड़ से ज्यादा होती थी, लेकिन पशुओं को इलाज के दौरान दी जाने वाली डाइक्लोफेनिक दवा के असर से गिद्ध मौत के आगोश में समाते गए और अब इनकी तादाद एक लाख से भी कम बची है।
इस पर शोध करने वाले अपर मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. अनिल शर्मा की मानें तो छठे व सातवें दशक में मृत पशुओं के शरीर में डीडीटी का अंश बढ़ने के कारण यह गिद्धों के शरीर में पहुंच गया। गिद्धों के अंडों की संरचना पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अधिकांश अंडे टूट जा रहे थे। दूसरी तरफ डाइक्लोफेनिक औषधि के कारण गिद्ध के गुर्दे में गाउट नामक रोग हो जाता है और किडनी फेल होने से वे मौत के मुंह में समा जाते हैं।
परियोजना अधिकारी डब्लूडब्लूएफ दबीर हसन ने कहा कि 11 मई 2006 को औषधि महानियंत्रक द्वारा सभी राज्यों में पशु चिकित्सकों को डाक्लोफेनिक औषधि का उपयोग करने व उत्पादन बिक्री पर रोक लगा दी गई थी। इसका असर सब जगह देखने को मिला। गिद्ध ही नहीं लगभग सभी जानवर जहां अनुकूल वातावरण पाते हें वहां स्वत: चले जाते हैं। वैसे भी गिद्ध के लिए प्रदूषण रहित जल आवश्यक है। गिद्ध भोजन के बाद तत्काल स्नान करते हैं। संभव है श्रावस्ती की राप्ती नदी व वहां का क्षेत्र उनके लिए अनुकूल हो।
डीएफओ, सोहेलया वन्यजीव प्रभाग, बलरामपुर कर्ण सिंह गौतम ने कहा कि सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग के आसपास गिद्धों की बढ़ रही संख्या पर्यावरण के लिए अच्छा संकेत है। बस हम लोगों को गिद्धों को एक अनुकूल वातावरण देना चाहिए। हमको गिद्धों को घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित स्थान, प्राकृतिक वासस्थल पर खनन व वृक्षों की कटान पर रोक, घायल गिद्धों का त्वरित उपचार व इसकी सूचना तत्काल क्षेत्रीय वन कार्यालय में देनी चाहिए, ताकि इनकी संख्या बढ़ सके।
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लगभग बीस वर्ष पूर्व सिरसिया में जंगल से सटे इलाके के साथ जमुनहा व गिलौला क्षेत्र में हर जगह गिद्धों के बड़े झुण्ड दिख जाते थे। हर झुण्ड में चालीस से पचास गिद्धों की मौजूदगी आम बात होती थी।
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धीरे-धीरे गिद्ध तराई से गायब होने लगे। अचानक गिद्धों के गायब होने के कारण पर्यावरण प्रेमियों व वन विभाग को भी चिंता सताने लगी थी। अब एक बार फिर से क्षेत्र में गिद्धों के दिखने से पर्यावरण प्रेमियों के साथ ही वन विभाग के लिए खुशखबरी है। रविवार को गिलौला क्षेत्र के दुर्गापुर में ऐसे ही गिद्धों के एक विशाल झुण्ड को देखा गया। सिरसिया के बघौड़ा रोड पर कई स्थानों पर गिद्ध दस से पंद्रह के झुण्ड में दिखाई दे रहे हैं।
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बॉम्बे नेचुरल सोसायटी के शोध के मुताबिक कभी देश में गिद्धों की संख्या चार करोड़ से ज्यादा होती थी, लेकिन पशुओं को इलाज के दौरान दी जाने वाली डाइक्लोफेनिक दवा के असर से गिद्ध मौत के आगोश में समाते गए और अब इनकी तादाद एक लाख से भी कम बची है।
इस पर शोध करने वाले अपर मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. अनिल शर्मा की मानें तो छठे व सातवें दशक में मृत पशुओं के शरीर में डीडीटी का अंश बढ़ने के कारण यह गिद्धों के शरीर में पहुंच गया। गिद्धों के अंडों की संरचना पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अधिकांश अंडे टूट जा रहे थे। दूसरी तरफ डाइक्लोफेनिक औषधि के कारण गिद्ध के गुर्दे में गाउट नामक रोग हो जाता है और किडनी फेल होने से वे मौत के मुंह में समा जाते हैं।
परियोजना अधिकारी डब्लूडब्लूएफ दबीर हसन ने कहा कि 11 मई 2006 को औषधि महानियंत्रक द्वारा सभी राज्यों में पशु चिकित्सकों को डाक्लोफेनिक औषधि का उपयोग करने व उत्पादन बिक्री पर रोक लगा दी गई थी। इसका असर सब जगह देखने को मिला। गिद्ध ही नहीं लगभग सभी जानवर जहां अनुकूल वातावरण पाते हें वहां स्वत: चले जाते हैं। वैसे भी गिद्ध के लिए प्रदूषण रहित जल आवश्यक है। गिद्ध भोजन के बाद तत्काल स्नान करते हैं। संभव है श्रावस्ती की राप्ती नदी व वहां का क्षेत्र उनके लिए अनुकूल हो।
डीएफओ, सोहेलया वन्यजीव प्रभाग, बलरामपुर कर्ण सिंह गौतम ने कहा कि सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग के आसपास गिद्धों की बढ़ रही संख्या पर्यावरण के लिए अच्छा संकेत है। बस हम लोगों को गिद्धों को एक अनुकूल वातावरण देना चाहिए। हमको गिद्धों को घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित स्थान, प्राकृतिक वासस्थल पर खनन व वृक्षों की कटान पर रोक, घायल गिद्धों का त्वरित उपचार व इसकी सूचना तत्काल क्षेत्रीय वन कार्यालय में देनी चाहिए, ताकि इनकी संख्या बढ़ सके।