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शोर ने बदली बाघों की दिनचर्या
अमर उजाला ब्यूरो/बहराइच
Updated Thu, 18 Jun 2015 09:58 PM IST
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में विचरण करने वाले बाघ और तेंदुओं की आदत धीरे-धीरे बदल रही है। अब शाम और भोर में जंगल की पगडंडियों पर सुनाई पड़ने वाली बाघ की दहाड़ मंद हो रही है। शाम और भोर के बजाए आधी रात के बाद जंगल का राजा भ्रमण पर निकलता है। इसका खुलासा हाल ही में कैमरा ट्रैपिंग से हुआ है। वन्यजीवों पर काम करने वाले विशेषज्ञों ने भी बाघ और तेंदुओं की बदल रही आदत को महसूस किया है। दिनचर्या परिवर्तन से बाघ और तेंदुओं पर क्या असर पड़ेगा, इस पर अध्ययन करने की रूपरेखा बनाई जा रही है। इस मामले में शासन को भी पत्र लिखा गया है।
551 वर्ग किलोमीटर में फैले कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में सात रेंज हैं। कतर्नियाघाट और निशानगाड़ा रेंज ऐसे हैं, जहां बाघ और तेंदुओं का मूवमेंट अधिक होता है। इन दोनो रेंजों में सुबह-शाम बाघ और तेंदुए पर्यटकों को रोमांचित करते थे लेकिन बीते दो साल से इनकी झलक पाने के लिए बेताब पर्यटकों को निराशा ही मिल रही है। कहने को तो संरक्षित वन क्षेत्र में 36 बाघ हैं और 54 से अधिक तेंदुए हैं लेकिन इनकी दहाड़ धीरे-धीरे मंद पड़ती जा रही है। सुबह से शाम तक जंगल की पगडंडियों पर भ्रमण करने के बाद हिरन, बारहसिंघा, काकड़, पाढ़ा, जंगली भैंसा, जंगली मुर्गा देखकर पर्यटक मन मसोस कर लौट जाते हैं। इसका मुख्य कारण जंगल में बढ़ रहे शोर-शराबे के चलते बाघ और तेंदुओं के रहन-सहन और आदत में आ रही तब्दीली को माना जा रहा है।
दो साल से आया परिवर्तन
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजनाधिकारी दबीर हसन की मानें तो वह भी बीते दो वर्षों में बाघ और तेंदुओं की आदत में हो रहे बदलाव को महसूस कर रहे हैं। दबीर ने बताया कि सामान्य तरीके से सुबह चार बजे से छह बजे के बीच और शाम चार बजे से सात बजे के मध्य बाघ और तेंदुओं के अपने परिक्षेत्र में भ्रमण का समय होता है। लेकिन दो वर्ष से सुबह और शाम के बजाए आधी रात के बाद ही यह दुर्लभ वन्यजीव विचरण करने को निकलते हैं। उन्होंने कहा कि माह भर पूर्व बाघ की गणना के लिए लगाए गए कैमरा ट्रैपिंग में भी इस बात का खुलासा हुआ है। दबीर का कहना है कि यह काफी गंभीर विषय है। इसे कैसे व्यवस्थित किया जाए, इस पर मंथन चल रहा है।
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एक-दूजे का वक्त टालते बाघ-तेंदुए
कतर्नियाघाट के प्रभागीय वनाधिकारी आशीष तिवारी का कहना है कि कतर्नियाघाट और निशानगाड़ा ऐसे रेंज हैं, जहां वर्ष भर बाघ और तेंदुओं को पानी मिल रहा है। जंगल भी घना है। ऐसे में कभी-कभी बाघ और तेंदुओं में टकराहट की नौबत बन जाती है, जिसके चलते बाघ और तेंदुओं ने जंगल में भ्रमण के समय को परिस्थिति के मुताबिक शेयर कर लिया है। उन्होंने कहा कि कैमरा ट्रैपिंग में इस बात की पुष्टि हुई है कि तेंदुए शाम से आधी रात के बीच दिखाई देते हैं, जबकि बाघ आधी रात के बाद अपनी मांद से निकलकर घूमता है। डीएफओ का कहना है कि शोर शराबा की स्थिति पहले जैसी ही है। नई आबादी नहीं बनी है। फिर ऐसा बदलाव क्यों, इसके कारणों पर अध्ययन किया जा रहा है। डीएफओ ने बताया कि प्रदेश के मुख्य वन संरक्षक और दुधवा नेशनल पार्क के फील्ड डायरेक्टर को इस मामले में अवगत कराया गया है।
इन मार्गों पर करते थे विचरण
बिछिया-गिरिजापुरी मार्ग पर 2012 में शाम पांच बजे सवारियों से भरे खड़खड़े के घोड़े को बाघ जंगल में खींच ले गया था। इसके अलावा वर्ष 2013 के अक्तूबर में इसी मार्ग पर शाम पांच बजे से रात आठ बजे तक तीन घंटे बाघिन शावक के साथ मौजूद थी। आवागमन पूरी तरह ठप था। इतना ही नहीं, गुलहरिया-जमुनिहा मार्ग पर सुबह और शाम बाघ और तेंदुए के कई हमले हुए लेकिन अब इन रास्तों पर लोग बेधड़क आते जाते हैं। बाघ और तेंदुए की एक झलक नहीं दिखती।
मानव दखलंदाजी है आदत बदलने का कारण
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में आठ वनग्राम हैं। इसके अलावा छोटी बाजारें और चौराहे की बाजारें भी हैं। साथ ही घने जंगल की पगडंडियों से होकर लोगों का आवागमन हो रहा है। संरक्षित क्षेत्र होने के बावजूद 24 घंटे वाहन फर्राटा भरते रहते हैं। ऐसे में लोगों के आवागमन और वाहनों के शोर से जंगल के वन्यजीवों पर असर पड़ रहा है। साथ ही जंगल के बीच से होकर रेल लाइन भी गुजरी है। इस पर 10 ट्रेनों का संचालन होता है। इस शोर के चलते ही बाघ और तेंदुओं के जंगल में विचरण का समय परिवर्तित हो रहा है। इसे वन्यजीव विशेषज्ञ महसूस कर रहे हैं लेकिन वे इस मामले में खुलकर नहीं कह रहे।
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551 वर्ग किलोमीटर में फैले कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में सात रेंज हैं। कतर्नियाघाट और निशानगाड़ा रेंज ऐसे हैं, जहां बाघ और तेंदुओं का मूवमेंट अधिक होता है। इन दोनो रेंजों में सुबह-शाम बाघ और तेंदुए पर्यटकों को रोमांचित करते थे लेकिन बीते दो साल से इनकी झलक पाने के लिए बेताब पर्यटकों को निराशा ही मिल रही है। कहने को तो संरक्षित वन क्षेत्र में 36 बाघ हैं और 54 से अधिक तेंदुए हैं लेकिन इनकी दहाड़ धीरे-धीरे मंद पड़ती जा रही है। सुबह से शाम तक जंगल की पगडंडियों पर भ्रमण करने के बाद हिरन, बारहसिंघा, काकड़, पाढ़ा, जंगली भैंसा, जंगली मुर्गा देखकर पर्यटक मन मसोस कर लौट जाते हैं। इसका मुख्य कारण जंगल में बढ़ रहे शोर-शराबे के चलते बाघ और तेंदुओं के रहन-सहन और आदत में आ रही तब्दीली को माना जा रहा है।
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दो साल से आया परिवर्तन
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजनाधिकारी दबीर हसन की मानें तो वह भी बीते दो वर्षों में बाघ और तेंदुओं की आदत में हो रहे बदलाव को महसूस कर रहे हैं। दबीर ने बताया कि सामान्य तरीके से सुबह चार बजे से छह बजे के बीच और शाम चार बजे से सात बजे के मध्य बाघ और तेंदुओं के अपने परिक्षेत्र में भ्रमण का समय होता है। लेकिन दो वर्ष से सुबह और शाम के बजाए आधी रात के बाद ही यह दुर्लभ वन्यजीव विचरण करने को निकलते हैं। उन्होंने कहा कि माह भर पूर्व बाघ की गणना के लिए लगाए गए कैमरा ट्रैपिंग में भी इस बात का खुलासा हुआ है। दबीर का कहना है कि यह काफी गंभीर विषय है। इसे कैसे व्यवस्थित किया जाए, इस पर मंथन चल रहा है।
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एक-दूजे का वक्त टालते बाघ-तेंदुए
कतर्नियाघाट के प्रभागीय वनाधिकारी आशीष तिवारी का कहना है कि कतर्नियाघाट और निशानगाड़ा ऐसे रेंज हैं, जहां वर्ष भर बाघ और तेंदुओं को पानी मिल रहा है। जंगल भी घना है। ऐसे में कभी-कभी बाघ और तेंदुओं में टकराहट की नौबत बन जाती है, जिसके चलते बाघ और तेंदुओं ने जंगल में भ्रमण के समय को परिस्थिति के मुताबिक शेयर कर लिया है। उन्होंने कहा कि कैमरा ट्रैपिंग में इस बात की पुष्टि हुई है कि तेंदुए शाम से आधी रात के बीच दिखाई देते हैं, जबकि बाघ आधी रात के बाद अपनी मांद से निकलकर घूमता है। डीएफओ का कहना है कि शोर शराबा की स्थिति पहले जैसी ही है। नई आबादी नहीं बनी है। फिर ऐसा बदलाव क्यों, इसके कारणों पर अध्ययन किया जा रहा है। डीएफओ ने बताया कि प्रदेश के मुख्य वन संरक्षक और दुधवा नेशनल पार्क के फील्ड डायरेक्टर को इस मामले में अवगत कराया गया है।
इन मार्गों पर करते थे विचरण
बिछिया-गिरिजापुरी मार्ग पर 2012 में शाम पांच बजे सवारियों से भरे खड़खड़े के घोड़े को बाघ जंगल में खींच ले गया था। इसके अलावा वर्ष 2013 के अक्तूबर में इसी मार्ग पर शाम पांच बजे से रात आठ बजे तक तीन घंटे बाघिन शावक के साथ मौजूद थी। आवागमन पूरी तरह ठप था। इतना ही नहीं, गुलहरिया-जमुनिहा मार्ग पर सुबह और शाम बाघ और तेंदुए के कई हमले हुए लेकिन अब इन रास्तों पर लोग बेधड़क आते जाते हैं। बाघ और तेंदुए की एक झलक नहीं दिखती।
मानव दखलंदाजी है आदत बदलने का कारण
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र में आठ वनग्राम हैं। इसके अलावा छोटी बाजारें और चौराहे की बाजारें भी हैं। साथ ही घने जंगल की पगडंडियों से होकर लोगों का आवागमन हो रहा है। संरक्षित क्षेत्र होने के बावजूद 24 घंटे वाहन फर्राटा भरते रहते हैं। ऐसे में लोगों के आवागमन और वाहनों के शोर से जंगल के वन्यजीवों पर असर पड़ रहा है। साथ ही जंगल के बीच से होकर रेल लाइन भी गुजरी है। इस पर 10 ट्रेनों का संचालन होता है। इस शोर के चलते ही बाघ और तेंदुओं के जंगल में विचरण का समय परिवर्तित हो रहा है। इसे वन्यजीव विशेषज्ञ महसूस कर रहे हैं लेकिन वे इस मामले में खुलकर नहीं कह रहे।