{"_id":"69766c6987c5b2652601abf5","slug":"demand-for-citizenship-from-nepali-daughters-in-law-increases-difficulty-bahraich-news-c-98-1-bhr1024-143438-2026-01-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bahraich News: नेपाली बहुओं से नागरिकता की मांग ने बढ़ाई मुश्किल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bahraich News: नेपाली बहुओं से नागरिकता की मांग ने बढ़ाई मुश्किल
Mon, 26 Jan 2026 12:48 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
Updated Mon, 26 Jan 2026 12:48 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बहराइच। जिंदगी की चौथी दहलीज पर खड़ी वे महिलाएं, जिन्होंने आधी सदी पहले सरहद पार कर अपना घर बसाया, आज पहचान के सवाल में घिर गई हैं। मायके में कोई नहीं, दस्तावेजों का सहारा भी नहीं, ऐसे में नागरिकता प्रमाणपत्र कहां से लाया जाए, यह सवाल अब प्रशासन के सामने भी चुनौती बन गया है।
एसआईआर के तहत नेपाली बहुओं से नागरिकता प्रमाणपत्र की मांग ने न सिर्फ परिवारों की नींद उड़ा दी है, बल्कि दशकों से बसे जीवन को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।
नेपाल के छिन्छू गांव निवासी शांति देवी की कहानी इस पीड़ा की सबसे सशक्त मिसाल है। 1950 के दशक में नवाबगंज में विवाह कर आईं शांति देवी का यहां भरा-पूरा परिवार है। भारत में ही उनका जीवन, परिवार और पहचान बनी, लेकिन वर्ष 2018 में नेपाल में आए भीषण भूकंप ने उनका मायका पूरी तरह उजाड़ दिया।
विज्ञापन
आज वहां न घर है, न कोई परिजन और न ही वे दस्तावेज़, जिनके आधार पर अब उनसे नागरिकता प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है।
यह समस्या सिर्फ शांति देवी तक ही सीमित नहीं है। सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसी सैकड़ों महिलाएं हैं, जो दशकों से भारत में रह रही हैं, जिनके बच्चे, पोते-पोतियां यहीं जन्मे और पले-बढ़े, लेकिन अब उनसे यह पूछा जा रहा है कि वे अपनी नागरिकता साबित करें। परिजन असमंजस में हैं कि जब मायका ही अस्तित्व में नहीं, तो प्रमाणपत्र आखिर कहां से लाया जाए।
वहीं इस एसआईआर मामलों में सुनवाई कर रहे खंड विकास अधिकारी नवाबगंज डॉ. राहुल पांडेय का कहना है कि बिना नागरिकता प्रमाणपत्र के नागरिक मानना संभव नहीं है। यही समस्या मिहींपुरवा, रुपईडीहा और बिछिया के साथ जिले के अन्य स्थानों पर आ रही है।
एसआईआर नोटिस की सुनवाई करने वाले अधिकारी यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि समस्या जटिल है और इसका कोई तात्कालिक समाधान उनके पास नहीं है। फिलहाल मामला उच्च अधिकारियों को भेजे जाने और मार्गदर्शन के इंतजार तक सीमित है।
विज्ञापन
एसआईआर के तहत नेपाली बहुओं से नागरिकता प्रमाणपत्र की मांग ने न सिर्फ परिवारों की नींद उड़ा दी है, बल्कि दशकों से बसे जीवन को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।
विज्ञापन
नेपाल के छिन्छू गांव निवासी शांति देवी की कहानी इस पीड़ा की सबसे सशक्त मिसाल है। 1950 के दशक में नवाबगंज में विवाह कर आईं शांति देवी का यहां भरा-पूरा परिवार है। भारत में ही उनका जीवन, परिवार और पहचान बनी, लेकिन वर्ष 2018 में नेपाल में आए भीषण भूकंप ने उनका मायका पूरी तरह उजाड़ दिया।
विज्ञापन
आज वहां न घर है, न कोई परिजन और न ही वे दस्तावेज़, जिनके आधार पर अब उनसे नागरिकता प्रमाणपत्र मांगा जा रहा है।
यह समस्या सिर्फ शांति देवी तक ही सीमित नहीं है। सीमावर्ती क्षेत्रों में ऐसी सैकड़ों महिलाएं हैं, जो दशकों से भारत में रह रही हैं, जिनके बच्चे, पोते-पोतियां यहीं जन्मे और पले-बढ़े, लेकिन अब उनसे यह पूछा जा रहा है कि वे अपनी नागरिकता साबित करें। परिजन असमंजस में हैं कि जब मायका ही अस्तित्व में नहीं, तो प्रमाणपत्र आखिर कहां से लाया जाए।
वहीं इस एसआईआर मामलों में सुनवाई कर रहे खंड विकास अधिकारी नवाबगंज डॉ. राहुल पांडेय का कहना है कि बिना नागरिकता प्रमाणपत्र के नागरिक मानना संभव नहीं है। यही समस्या मिहींपुरवा, रुपईडीहा और बिछिया के साथ जिले के अन्य स्थानों पर आ रही है।
एसआईआर नोटिस की सुनवाई करने वाले अधिकारी यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि समस्या जटिल है और इसका कोई तात्कालिक समाधान उनके पास नहीं है। फिलहाल मामला उच्च अधिकारियों को भेजे जाने और मार्गदर्शन के इंतजार तक सीमित है।