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नोमेंस लैंड पर अतिक्रमण
Updated Thu, 28 Dec 2017 11:49 PM IST
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बहराइच/रुपईडीहा। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित नोमेंस लैंड अतिक्रमण की जद में हैं। सीमा पर जगह-जगह अतिक्रमण कर लोगों ने घर और अहाते बना लिए हैं। खलिहान के साथ घूर लगा रहे हैं। कुछ स्थानों पर फसलें भी लहलहा रही हैं। जिसके चलते इस प्रतिबंधित क्षेत्र मेें न तो भारतीय पुलिस कार्रवाई करती है न ही नेपाली पुलिस। ऐसे मकान, अहाते और खेत घुसपैठ करने वाले अराजक तत्वों के लिए आए दिन आरामगाह साबित होते हैं। संवेदनशील सीमा होने के बाद भी सीमा सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे।
बहराइच जिले से सटी नेपाल की खुली सीमा अराजक तत्वों को अरसे से रास आ रही है। कभी आतंकी मशरूर तो कभी जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकी सीमा की सुरक्षा में सेंध लगाते रहे हैं। तीन वर्ष पूर्व इंडियन मुजाहिदीन के फरार आतंकी अफजल ने भी छिपने के लिए नेपाल की खुली सीमा का सहारा लिया था। उसे मुंबई एटीएस के अधिकारियों की टीम ने रुपईडीहा थाना क्षेत्र के नेपालगंज रोड रेलवे स्टेशन के निकट नोमेंसलैंड के पास से ही दबोचा था। इसके पूर्व भी देश विरोधी तत्व घुसपैठ करते रहे हैं। हालांकि भारत-नेपाल के मुख्य रास्तों पर कड़ी चौकसी के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन मोतीपुर, मुर्तिहा, रुपईडीहा और नवाबगंज थाना क्षेत्रों में ग्रामीण अंचलों में नोमेंस लैंड से बने रास्तों पर अक्सर सन्नाटा पसरा रहता है। खास बात यह है कि मोतीपुर से रुपईडीहा थाना क्षेत्र के मध्य 19 स्थानों पर नोमेंस लैंड पर नेपाल क्षेत्र के लोगों ने अतिक्रमण कर मकान और अहाते बना रखे हैं। तिलहन, गेहूं, आलू और गन्ने की फसल लहलहा रही है। लेकिन नोमेंस लैंड का परिक्षेत्र प्रतिबंधित होता है। जिसके चलते यहां पर न तो भारतीय पुलिस और न ही नेपाली पुलिस कार्रवाई करती है। जिस कारण नोमेंस लैंड पर कब्जा कर बनाए गए मकानों और अहातों में दहशतगर्द आसानी से शरण लेकर सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती बनते हैं।
ये है नोमेंस लैंड
दो देशों की सीमा की पहचान के लिए दोनों देशों की ओर से 10-10 मीटर जमीन छोड़ी जाती है। इस जमीन में दोनों देशों के पिलर (सीमा पहचान स्तंभ) लगाए जाते हैं। दोनों देशों की जिम्मेदारी होती है कि नोमेंस लैंड पर न अतिक्रमण हो और न ही किसी भी प्रकार की गतिविधियां हों। गौरतलब हो कि भारत-नेपाल की सीमा 1751 किलोमीटर लंबी है। बहराइच जिले में यह सीमा 100 किलोमीटर के दायरे में है।
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यहां हैं अधिक कब्जे
रुपईडीहा थाना अंतर्गत पिलर संख्या 30-33 के मध्य घूर, खलिहान और खेत लहलहा रहे हैं। जबकि पिलर संख्या 38-45 के मध्य कई स्थानों पर नेपाल के कुछ नागरिकों ने नोमेंस लैंड पर कब्जा कर खेती शुरू कर दी है। मुर्तिहा कोतवाली में ग्राम पटाव के निकट नेपालियों के अहाते और मकान निर्मित हैं। घुमनाभारू, लौकाही और बलई गांव के निकट आठ स्थानों पर मकान निर्मित हैं। खेत लहलहा रहे हैं।
2000 से पहले के हैं कब्जे, स्टेट गवर्नमेंट को लिखा पत्र
नोमेंस लैंड पर जो भी अतिक्रमण और कब्जे हैं वे वर्ष 2000 से पहले के हैं। कोई नया अतिक्रमण नहीं होने दिया गया है। स्थिति जस की तस है। सीमा की सुरक्षा के लिए निरंतर निगरानी की जा रही है। कब्जे हटवाने की जिम्मेदारी एसएसबी की नहीं। निगरानी के साथ सीमा पर नई गतिविधियां न हों, इस पर नजर रखी जा रही है। दोनों देशों की बैठक में अतिक्रमण व अन्य मुद्दों पर सामूहिक फैसला होता है। सीमा क्षेत्र के जो हालात हैं, इस मामले से उच्चाधिकारियों को समय-समय पर अवगत कराया जाता है। -जयप्रकाश, उप सेनानायक एसएसबी
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बहराइच जिले से सटी नेपाल की खुली सीमा अराजक तत्वों को अरसे से रास आ रही है। कभी आतंकी मशरूर तो कभी जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकी सीमा की सुरक्षा में सेंध लगाते रहे हैं। तीन वर्ष पूर्व इंडियन मुजाहिदीन के फरार आतंकी अफजल ने भी छिपने के लिए नेपाल की खुली सीमा का सहारा लिया था। उसे मुंबई एटीएस के अधिकारियों की टीम ने रुपईडीहा थाना क्षेत्र के नेपालगंज रोड रेलवे स्टेशन के निकट नोमेंसलैंड के पास से ही दबोचा था। इसके पूर्व भी देश विरोधी तत्व घुसपैठ करते रहे हैं। हालांकि भारत-नेपाल के मुख्य रास्तों पर कड़ी चौकसी के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन मोतीपुर, मुर्तिहा, रुपईडीहा और नवाबगंज थाना क्षेत्रों में ग्रामीण अंचलों में नोमेंस लैंड से बने रास्तों पर अक्सर सन्नाटा पसरा रहता है। खास बात यह है कि मोतीपुर से रुपईडीहा थाना क्षेत्र के मध्य 19 स्थानों पर नोमेंस लैंड पर नेपाल क्षेत्र के लोगों ने अतिक्रमण कर मकान और अहाते बना रखे हैं। तिलहन, गेहूं, आलू और गन्ने की फसल लहलहा रही है। लेकिन नोमेंस लैंड का परिक्षेत्र प्रतिबंधित होता है। जिसके चलते यहां पर न तो भारतीय पुलिस और न ही नेपाली पुलिस कार्रवाई करती है। जिस कारण नोमेंस लैंड पर कब्जा कर बनाए गए मकानों और अहातों में दहशतगर्द आसानी से शरण लेकर सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती बनते हैं।
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ये है नोमेंस लैंड
दो देशों की सीमा की पहचान के लिए दोनों देशों की ओर से 10-10 मीटर जमीन छोड़ी जाती है। इस जमीन में दोनों देशों के पिलर (सीमा पहचान स्तंभ) लगाए जाते हैं। दोनों देशों की जिम्मेदारी होती है कि नोमेंस लैंड पर न अतिक्रमण हो और न ही किसी भी प्रकार की गतिविधियां हों। गौरतलब हो कि भारत-नेपाल की सीमा 1751 किलोमीटर लंबी है। बहराइच जिले में यह सीमा 100 किलोमीटर के दायरे में है।
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यहां हैं अधिक कब्जे
रुपईडीहा थाना अंतर्गत पिलर संख्या 30-33 के मध्य घूर, खलिहान और खेत लहलहा रहे हैं। जबकि पिलर संख्या 38-45 के मध्य कई स्थानों पर नेपाल के कुछ नागरिकों ने नोमेंस लैंड पर कब्जा कर खेती शुरू कर दी है। मुर्तिहा कोतवाली में ग्राम पटाव के निकट नेपालियों के अहाते और मकान निर्मित हैं। घुमनाभारू, लौकाही और बलई गांव के निकट आठ स्थानों पर मकान निर्मित हैं। खेत लहलहा रहे हैं।
2000 से पहले के हैं कब्जे, स्टेट गवर्नमेंट को लिखा पत्र
नोमेंस लैंड पर जो भी अतिक्रमण और कब्जे हैं वे वर्ष 2000 से पहले के हैं। कोई नया अतिक्रमण नहीं होने दिया गया है। स्थिति जस की तस है। सीमा की सुरक्षा के लिए निरंतर निगरानी की जा रही है। कब्जे हटवाने की जिम्मेदारी एसएसबी की नहीं। निगरानी के साथ सीमा पर नई गतिविधियां न हों, इस पर नजर रखी जा रही है। दोनों देशों की बैठक में अतिक्रमण व अन्य मुद्दों पर सामूहिक फैसला होता है। सीमा क्षेत्र के जो हालात हैं, इस मामले से उच्चाधिकारियों को समय-समय पर अवगत कराया जाता है। -जयप्रकाश, उप सेनानायक एसएसबी