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11 साल से कानून के लचीलेपन का फायदा उठा रहा था वहशी
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बहराइच/नानपारा। बेटी सिंहनी के साथ बर्बरता के मामले में फांसी की सजा पाने वाला वहशी पहले भी दुष्कर्म की एक वारदात को अंजाम दे चुका था। 11 साल पहले हुई वारदात में उसने तीन महीने की जेल भी काटी थी, लेकिन कानून के लचीले होने और दांव-पेच के कारण वह जमानत पर बाहर आकर घूम रहा था। पुलिस ने अब इसकी परतें उधेड़नी शुरू की हैं तो परत दर परत उसकी वहशियाना हरकतें खुलकर सामने आने लगी हैं।
नानपारा की बेटी सिंहनी के साथ हुई बर्बरता की दास्तां सुन लोगों के रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं। 22 जून की वह काली रात आज भी लोगों के जहन को झकझोर देती है। अदालत ने सोमवार को जब उस वहशी दरिंदे को फांसी की सजा सुनाई तो लोगों में न्यायपालिका के प्रति विश्वास और भी मजबूत होता चला गया। पुलिस ने जब उसकी वहशियाना हरकतों की फेहरिस्त को खंगालना शुरू किया तो पता चला कि कोतवाली नानपारा क्षेत्र के ही एक गांव की रहने वाली महिला के साथ उसने छह अगस्त 2010 को भी दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया था। पुलिस ने उस समय मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेजा था। करीब तीन माह बाद कानूनी दांवपेंच अपनाते हुए वह कानून के शिकंजे से अक्तूबर माह में बाहर निकल गया। हालांकि, उस समय देश में बहुत अधिक इसे लेकर गुस्सा नहीं था। मगर उसके बाद कानून सख्त हुए और डेढ़ साल की मासूम सिंहनी के साथ उसने एक बार फिर वहशीपन की हदें पार की। मगर इस बार अदालत ने भी नरमी का रूप नहीं अपनाया। अपर सत्र न्यायाधीश नितिन पांडेय ने विशेष लोक अभियोजक संतप्रताप सिंह की बहस को सुनते हुए उसे फांसी की सजा सुनाई है।
जेल की चहारदीवारी के अंदर सोमवार को दुष्कर्मी परशुराम को पुलिस लेकर पहुंची। वह जब जेल के अंदर गया तो जेल के अधिकारिक सूत्रों के अनुसार वह बिलख कर रोने लगा। दूसरे बंदियों को देखकर उसकी आंखों से आंसू निकल रहे थे मगर जेल का हर बंदी और पुलिस कर्मी उसे हीनभावना से ही देख रहे थे। हालांकि, बाद में उसका व्यवहार सामान्य रहा। जेलर आनंद शुक्ला ने बताया कि उसके व्यवहार में अब कोई परिवर्तन नहीं देखा गया है। वह दो माह से जेल में ही है। सोमवार को उसे कोर्ट भेजा गया था।
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नानपारा की बेटी सिंहनी के साथ हुई बर्बरता की दास्तां सुन लोगों के रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं। 22 जून की वह काली रात आज भी लोगों के जहन को झकझोर देती है। अदालत ने सोमवार को जब उस वहशी दरिंदे को फांसी की सजा सुनाई तो लोगों में न्यायपालिका के प्रति विश्वास और भी मजबूत होता चला गया। पुलिस ने जब उसकी वहशियाना हरकतों की फेहरिस्त को खंगालना शुरू किया तो पता चला कि कोतवाली नानपारा क्षेत्र के ही एक गांव की रहने वाली महिला के साथ उसने छह अगस्त 2010 को भी दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया था। पुलिस ने उस समय मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेजा था। करीब तीन माह बाद कानूनी दांवपेंच अपनाते हुए वह कानून के शिकंजे से अक्तूबर माह में बाहर निकल गया। हालांकि, उस समय देश में बहुत अधिक इसे लेकर गुस्सा नहीं था। मगर उसके बाद कानून सख्त हुए और डेढ़ साल की मासूम सिंहनी के साथ उसने एक बार फिर वहशीपन की हदें पार की। मगर इस बार अदालत ने भी नरमी का रूप नहीं अपनाया। अपर सत्र न्यायाधीश नितिन पांडेय ने विशेष लोक अभियोजक संतप्रताप सिंह की बहस को सुनते हुए उसे फांसी की सजा सुनाई है।
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जेल की चहारदीवारी के अंदर सोमवार को दुष्कर्मी परशुराम को पुलिस लेकर पहुंची। वह जब जेल के अंदर गया तो जेल के अधिकारिक सूत्रों के अनुसार वह बिलख कर रोने लगा। दूसरे बंदियों को देखकर उसकी आंखों से आंसू निकल रहे थे मगर जेल का हर बंदी और पुलिस कर्मी उसे हीनभावना से ही देख रहे थे। हालांकि, बाद में उसका व्यवहार सामान्य रहा। जेलर आनंद शुक्ला ने बताया कि उसके व्यवहार में अब कोई परिवर्तन नहीं देखा गया है। वह दो माह से जेल में ही है। सोमवार को उसे कोर्ट भेजा गया था।
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