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Baghpat News: भारतीय संस्कृति का मूल संस्कृत में निहित
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-ग्वालीखेड़ा के दादू बलराम संस्कृत महाविद्यालय में हुई गोष्ठी
फोटो संख्या 1
बिनौली। श्री दादू बलराम संस्कृत महाविद्यालय ग्वालीखेड़ा में रविवार को विचार गोष्ठी हुई, जिसमें विद्वानों ने गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को सर्वश्रेष्ठ, संस्कृत को संस्कृति की पहचान बताया।
गोष्ठी का शुभारंभ महाविद्यालय के संस्थापक गुरु महंत बलराम स्वामी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। गोष्ठी के मुख्य अतिथि शिक्षाविद पूर्व विधायक डॉ. अजय तोमर ने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल संस्कृत में निहित है। संस्कृत भाषा से संस्कार मिलते हैं। गुरुकुलों में छात्रों के उत्तम चरित्र का निर्माण होता है। गोष्ठी में सुखवीर सिंह गठीना, आचार्य विनोद कुमार, डॉ. अरविंद तिवारी, वेदप्रकाश शर्मा ने भी विचार रखे। प्राचार्य ब्रजमोहन शर्मा ने अतिथियों को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। इससे पहले महाविद्यालय के संस्थापक महंत बलराम स्वामी की 42वीं पुण्यतिथि पर यज्ञ-हवन किया गया। अध्यक्षता महंत डॉ. साधुराम स्वामी, संचालन सतेंद्र मोघा, अमरेश शास्त्री ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर डॉ. साहब सिंह, डॉ. महंत रामदास स्वामी, सागर शास्त्री, श्रवणदास स्वामी, विवेक शास्त्री, हरिदास स्वामी आदि उपस्थित रहे।
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फोटो संख्या 1
बिनौली। श्री दादू बलराम संस्कृत महाविद्यालय ग्वालीखेड़ा में रविवार को विचार गोष्ठी हुई, जिसमें विद्वानों ने गुरुकुलीय शिक्षा प्रणाली को सर्वश्रेष्ठ, संस्कृत को संस्कृति की पहचान बताया।
गोष्ठी का शुभारंभ महाविद्यालय के संस्थापक गुरु महंत बलराम स्वामी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। गोष्ठी के मुख्य अतिथि शिक्षाविद पूर्व विधायक डॉ. अजय तोमर ने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल संस्कृत में निहित है। संस्कृत भाषा से संस्कार मिलते हैं। गुरुकुलों में छात्रों के उत्तम चरित्र का निर्माण होता है। गोष्ठी में सुखवीर सिंह गठीना, आचार्य विनोद कुमार, डॉ. अरविंद तिवारी, वेदप्रकाश शर्मा ने भी विचार रखे। प्राचार्य ब्रजमोहन शर्मा ने अतिथियों को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। इससे पहले महाविद्यालय के संस्थापक महंत बलराम स्वामी की 42वीं पुण्यतिथि पर यज्ञ-हवन किया गया। अध्यक्षता महंत डॉ. साधुराम स्वामी, संचालन सतेंद्र मोघा, अमरेश शास्त्री ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर डॉ. साहब सिंह, डॉ. महंत रामदास स्वामी, सागर शास्त्री, श्रवणदास स्वामी, विवेक शास्त्री, हरिदास स्वामी आदि उपस्थित रहे।
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