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फैक्ट्री के प्रदूषण से काले पड़ गए बंदर
ब्यूरो\ अमर उजाला, बागपत
Updated Mon, 09 Jan 2017 01:03 AM IST
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लोगों के कौतूहल का सबब बने काले बंदर।
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खेकड़ा की ये तस्वीर आपको हैरान कर सकती है। सुभानपुर गांव के जंगल में यमुना के निकट काले रंग के बंदर उछल-कूद कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में इनका रंग काला नहीं है। बंदरों की यह टोली टायर गलाने की फैक्ट्री से निकलने वाले धुएं और राख के प्रदूषण में रंगकर काली हो गई है।
सुभानपुर गांव के जंगल में उछल-कूद करते काले रंग के बंदरों को देखकर हर कोई हैरान रह जाता है। इन बंदरों का रंग बदला है, लेकिन यहां के वातावरण से। बागपत और लोनी के बीच के इस इलाके में टायर गलाकर तेल निकालने की फैक्ट्री है। बाद में यह तेल जलाने के काम में आता है। पुराने टायर खरीदकर यहां जलाए जाते हैं।
फैक्ट्री से निकलने वाले धुएं और कालिख का असर आसपास के वातावरण पर साफ देखा जा सकता है। इस फैक्ट्री के आसपास ठिकाना बनाए बंदरों का एक झुंड सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। बंदरों की यह टोली फैक्ट्री की छत और इसके अंदर धमाल मचाती है। इसी दौरान इन पर कालिख चढ़ गई है।
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क्या कहते हैं ग्रामीण?
खेकड़ा। सांकरौद गांव के किसान तेजपाल सिंह बताते हैं कि उन्होंने यहां कई बीघा जमीन ठेके पर लेकर ईख लगा रखी है। बंदरों का यह झुंड सामान्य था, लेकिन फैक्ट्री में आने-जाने के कारण इनका रंग ही बदल गया है। महिला संतोष और प्रमिला का कहना है कि फैक्ट्री के धुएं से यहां के लोगों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। प्रशासन से कई बार हालात में सुधार की मांग की चुकी है, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं हुआ है।
फैक्ट्री चलाने के लिए सभी प्रकार की अनुमति के प्रमाण पत्र हैं। धुएं या कालिख से स्वास्थ्य पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ता। जो आरोप ग्रामीण लगा रहे हैं, वह बेबुनियाद हैं।
- मुकेश चौहान, फैक्ट्री मैनेजर
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सुभानपुर गांव के जंगल में उछल-कूद करते काले रंग के बंदरों को देखकर हर कोई हैरान रह जाता है। इन बंदरों का रंग बदला है, लेकिन यहां के वातावरण से। बागपत और लोनी के बीच के इस इलाके में टायर गलाकर तेल निकालने की फैक्ट्री है। बाद में यह तेल जलाने के काम में आता है। पुराने टायर खरीदकर यहां जलाए जाते हैं।
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फैक्ट्री से निकलने वाले धुएं और कालिख का असर आसपास के वातावरण पर साफ देखा जा सकता है। इस फैक्ट्री के आसपास ठिकाना बनाए बंदरों का एक झुंड सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। बंदरों की यह टोली फैक्ट्री की छत और इसके अंदर धमाल मचाती है। इसी दौरान इन पर कालिख चढ़ गई है।
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क्या कहते हैं ग्रामीण?
खेकड़ा। सांकरौद गांव के किसान तेजपाल सिंह बताते हैं कि उन्होंने यहां कई बीघा जमीन ठेके पर लेकर ईख लगा रखी है। बंदरों का यह झुंड सामान्य था, लेकिन फैक्ट्री में आने-जाने के कारण इनका रंग ही बदल गया है। महिला संतोष और प्रमिला का कहना है कि फैक्ट्री के धुएं से यहां के लोगों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। प्रशासन से कई बार हालात में सुधार की मांग की चुकी है, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं हुआ है।
फैक्ट्री चलाने के लिए सभी प्रकार की अनुमति के प्रमाण पत्र हैं। धुएं या कालिख से स्वास्थ्य पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ता। जो आरोप ग्रामीण लगा रहे हैं, वह बेबुनियाद हैं।
- मुकेश चौहान, फैक्ट्री मैनेजर