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लाक्षागृह: जहां पांडवों को जिंदा जलाकर मारने की कौरवों ने रची थी साजिश, समेटै है पांच हजार वर्ष पुराना इतिहास

Tue, 06 Feb 2024 02:54 PM IST
मेरठ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Updated Tue, 06 Feb 2024 02:54 PM IST
सार

लाक्षागृह का नाम सुनते ही महाभारतकाल की बातें जेहन में आने लगती हैं। यह वही स्थान है जहां कभी कौरवों ने पांडवों को जिंदा जलाकर मारने की साजिश रची थी। हालांकि पांडव  सुरंग के जरिए सुरक्षित निकल गए थे।

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Lakshgriha contains five thousand years old history
बरनावा में लाक्षागृह - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

बागपत जनपद स्थित बरनावा का लाक्षागृह पांच हजार साल पुराना इतिहास अपने अंदर समेटे हुए है। यहां से उत्खनन में महाभारत कालीन अवशेष भी बरामद किए गए। इसके अलावा लाक्षागृह पर आस्था भी अटूट है। विवाद होने के बावजूद कांवड़ियों ने जलाभिषेक कर दिया था और वहां पुलिस ने लाठीचार्ज तक किया था।

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लाक्षागृह का नाम सुनते ही हर किसी के मन में महाभारत काल की बातें ताजा हो जाती हैं और पांडवों को जिंदा जलाकर मारने की साजिश भी जुबां पर आ जाती है। जिससे बचने के लिए पांडवों ने एक सुरंग का सहारा लिया। वह सुरंग आज भी लाक्षागृह में मौजूद है, जो महाभारतकालीन होने की गवाही दे रही है। लाक्षागृह के पांच हजार साल पुराने इतिहास का पता करने के लिए पंद्रह साल पहले सर्वेक्षण हुआ था।
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यह भी पढ़ें:  क्या है प्राचीन टीला विवाद: मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज, मस्जिद-कब्रिस्तान नहीं, वहां है लाक्षागृह और शिव मंदिर 

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Lakshgriha contains five thousand years old history
बरनावा में एतिहासिक स्थल - फोटो : Amar Ujala

उसके बाद एएसआई के तत्कालीन प्रोफेसर देवीलाल की देखरेख में उत्खनन शुरू हुआ। जहां से चित्रित धूसर मृदभांड मिले, जिनकी कार्बन डेटिंग से मृदभांड के पांच हजार वर्ष पुराने होने की जानकारी मिली। जिनके महाभारतकालीन होने का दावा भी किया गया और रिपोर्ट एएसआई को भेज दी गई थी।

वर्ष 2018 में एएसआई ने बड़े स्तर पर टीले पर उत्खनन किया था। यहां से महाभारतकालीन अवशेष और बड़ी ईंटों की दीवारें भी मिल चुकी हैं। जिसके बाद संरक्षित कर दिया गया था।

Lakshgriha contains five thousand years old history
बरनावा का एतिहासिक टीला - फोटो : Amar Ujala

ब्रह्मऋषि कृष्णदत महाराज ने की गुरुकुल की स्थापना
महाभारत कालीन ऐतिहासिक लाक्षागृह टीले पर पूर्व जन्म के श्रंगी ऋषि कृष्णदत्त महाराज ने वर्ष 1966 में गुरुकुल की स्थापना की थी। अब यहां पर श्री महानंद संस्कृत विद्यालय चलता है।

प्रधानाचार्य आचार्य अरविंद कुमार शास्त्री ने बताया कि इस समय विद्यालय में यूपी, हरियाणा, छतीसगढ़, दिल्ली आदि विभिन्न प्रांतों से करीब 200 बच्चे संस्कृत के साथ वेदों और शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

उन्होंने बताया कि विद्यालय में पांच यज्ञ शालाएं हैं। जिन पर वर्ष भर में श्रावणी पर्व व गुरुकुल संस्थापक ब्रह्मऋषि कृष्णदत्त महाराज के जन्मोत्सव पर सामवेद पारायण महायज्ञ तथा फाल्गुन मास में आठ दिवसीय चतुर्वेद पारायण महायज्ञ होता है।
 

अमर उजाला मे प्रकासित खबर । संवाद

अमर उजाला में प्रकाशित  खबर । संवाद

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