{"_id":"62d70436468aa235894bc1ec","slug":"lakhs-of-devotees-from-many-states-perform-jalabhishek-in-pura-mahadev-baghpat-news-mrt5976905172","type":"story","status":"publish","title_hn":"पुरा महादेव में कई राज्यों के लाखों श्रद्धालु करते हैं जलाभिषेक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पुरा महादेव में कई राज्यों के लाखों श्रद्धालु करते हैं जलाभिषेक
विज्ञापन
पुरा महादेव मंदिर
- फोटो : BAGHPAT
पुरा महादेव में कई राज्यों के लाखों श्रद्धालु करते हैं जलाभिषेक
बालैनी (बागपत)। पुरा गांव के परशुरामेश्वर महादेव मंदिर की दूर-दूर तक मान्यता है। यहां कई राज्यों के श्रद्धालु भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं। परशुरामेश्वर मंदिर पर साल में दो बार फाल्गुन और श्रावण में कांवड़ मेले का आयोजन किया जाता है। लोगों की मान्यता है कि भगवान शिव का जलाभिषेक करने से उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो जातीं हैं।
---
इसलिए है मंदिर की मान्यता
मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित जय भगवान शर्मा बताते है कि कभी यहां कजरी वन हुआ करता था। वन में जमदग्नि ऋषि और उनकी पत्नी रेणुका आश्रम में रहते थे। रेणुका प्रतिदिन कच्चे घड़े में हिंडन नदी से जल लाकर शिव को अर्पण करती थी। एक बार राजा सहस्त्रबाहु शिकार करते हुए आश्रम में पहुंचे और कामधेनु गाय व रेणुका को बलपूर्वक अपने साथ हस्तिनापुर लेकर चले गए। रेणुका वहां से वापस आई तो जमदग्नि ऋषि की आज्ञा से भगवान परशुराम ने अपनी मां रेणुका का सिर धड़ से अलग का दिया था। इसके बाद उन्होंने मां की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की तपस्या की थी और यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। बाद में लिंडोरा की राजकुमारी ने यहां मंदिर का निर्माण कराया था।
--
यूपी के कई जिलों समेत हरियाणा, पंजाब व दिल्ली के श्रद्धालु करते है जलाभिषेक
फाल्गुन व श्रावण में लाखों कांवडिया हरिद्वार से गंगाजल लाकर पुरा गांव के परशुरामेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। जहां फाल्गुन में कांवड़ियों की संख्या कुछ कम होती है, वहीं श्रावण में बड़ी संख्या में कांवड़ियां पहुंचते हैं। यहां हरियाणा, पंजाब, दिल्ली प्रदेश के श्रद्धालु भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करेंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
बालैनी (बागपत)। पुरा गांव के परशुरामेश्वर महादेव मंदिर की दूर-दूर तक मान्यता है। यहां कई राज्यों के श्रद्धालु भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं। परशुरामेश्वर मंदिर पर साल में दो बार फाल्गुन और श्रावण में कांवड़ मेले का आयोजन किया जाता है। लोगों की मान्यता है कि भगवान शिव का जलाभिषेक करने से उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो जातीं हैं।
---
इसलिए है मंदिर की मान्यता
मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित जय भगवान शर्मा बताते है कि कभी यहां कजरी वन हुआ करता था। वन में जमदग्नि ऋषि और उनकी पत्नी रेणुका आश्रम में रहते थे। रेणुका प्रतिदिन कच्चे घड़े में हिंडन नदी से जल लाकर शिव को अर्पण करती थी। एक बार राजा सहस्त्रबाहु शिकार करते हुए आश्रम में पहुंचे और कामधेनु गाय व रेणुका को बलपूर्वक अपने साथ हस्तिनापुर लेकर चले गए। रेणुका वहां से वापस आई तो जमदग्नि ऋषि की आज्ञा से भगवान परशुराम ने अपनी मां रेणुका का सिर धड़ से अलग का दिया था। इसके बाद उन्होंने मां की हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की तपस्या की थी और यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। बाद में लिंडोरा की राजकुमारी ने यहां मंदिर का निर्माण कराया था।
विज्ञापन
--
यूपी के कई जिलों समेत हरियाणा, पंजाब व दिल्ली के श्रद्धालु करते है जलाभिषेक
फाल्गुन व श्रावण में लाखों कांवडिया हरिद्वार से गंगाजल लाकर पुरा गांव के परशुरामेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। जहां फाल्गुन में कांवड़ियों की संख्या कुछ कम होती है, वहीं श्रावण में बड़ी संख्या में कांवड़ियां पहुंचते हैं। यहां हरियाणा, पंजाब, दिल्ली प्रदेश के श्रद्धालु भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करेंगे।
विज्ञापन