{"_id":"655a082e56e69bd2ed0ee8d4","slug":"even-gods-come-due-to-the-influence-of-virtue-baghpat-news-c-31-1-smrt1003-4072-2023-11-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"Baghpat News: पुण्य के प्रभाव से देव भी आते हैं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Baghpat News: पुण्य के प्रभाव से देव भी आते हैं
विज्ञापन
-जैनमुनि विशुद्ध सागर महाराज पंचकल्याणक महोसव के दौरान धर्मसभा में बोल
फोटो संख्या 8
बड़ौत। दिगम्बर जैनाचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि धन्य है वह मां जिसकी कोख से तीर्थंकर जैसे महापुरुष जन्म लेते हैं। जहां प्रभु विराजते हैं, वहां उस मंदिर की देहरी भी पूज्य हो जाती है।
जैनमुनि पंचकल्याणक महोसव के दौरान धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय वसुन्धरा पर पुराकाल से ही चारित्र पूज्य रहा है। भारत भूमि विचारकों के साथ-साथ आचारकों की भूमि रही है। पवित्र-विचारों के साथ चर्या भी पवित्र होना चाहिए। पवित्र-जीवन वे ही जी पाएंगे, जिनके विचार पवित्र होंगे। विचारों के अनुसार ही व्यक्ति का जीवन होता है। जैसा बीज होगा, वैसा फल लगेगा। जैसा व्यक्ति का भोजन होगा वैसा ही उसका मन होगा भावों के अनुसार ही व्यक्ति की भाषा होती है। तीर्थंकर बालक का जन्म होते ही तीनों लोकों के जीवों को शान्ति का वेदन होता है। पुण्यात्मा के संयोग से पुण्य-क्षीण को भी सुकून मिलता है। उन्नति प्राप्त करना है तो श्रेष्ठ-जनों की संगति करो। श्रेष्ठ-जनों की सत-संगति से ज्ञान-चारित्र, परिणाम विशुद्धि में वृद्धि होती है। तीर्थंकर बालक के जन्म महोत्सव में स्वर्ग के देव भी महोत्सव मनाने आते हैं। वह किसी बुलाने पर नहीं आते, पुण्यात्मा प्रभाव से लोग स्वयमेव आते हैं। पुण्यात्मा के जन्म पर महोत्सव मनते हैं और पुण्य क्षीण के जन्म पर कोई ताली बजाने भी नहीं आता है। संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया।
विज्ञापन
फोटो संख्या 8
बड़ौत। दिगम्बर जैनाचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि धन्य है वह मां जिसकी कोख से तीर्थंकर जैसे महापुरुष जन्म लेते हैं। जहां प्रभु विराजते हैं, वहां उस मंदिर की देहरी भी पूज्य हो जाती है।
जैनमुनि पंचकल्याणक महोसव के दौरान धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय वसुन्धरा पर पुराकाल से ही चारित्र पूज्य रहा है। भारत भूमि विचारकों के साथ-साथ आचारकों की भूमि रही है। पवित्र-विचारों के साथ चर्या भी पवित्र होना चाहिए। पवित्र-जीवन वे ही जी पाएंगे, जिनके विचार पवित्र होंगे। विचारों के अनुसार ही व्यक्ति का जीवन होता है। जैसा बीज होगा, वैसा फल लगेगा। जैसा व्यक्ति का भोजन होगा वैसा ही उसका मन होगा भावों के अनुसार ही व्यक्ति की भाषा होती है। तीर्थंकर बालक का जन्म होते ही तीनों लोकों के जीवों को शान्ति का वेदन होता है। पुण्यात्मा के संयोग से पुण्य-क्षीण को भी सुकून मिलता है। उन्नति प्राप्त करना है तो श्रेष्ठ-जनों की संगति करो। श्रेष्ठ-जनों की सत-संगति से ज्ञान-चारित्र, परिणाम विशुद्धि में वृद्धि होती है। तीर्थंकर बालक के जन्म महोत्सव में स्वर्ग के देव भी महोत्सव मनाने आते हैं। वह किसी बुलाने पर नहीं आते, पुण्यात्मा प्रभाव से लोग स्वयमेव आते हैं। पुण्यात्मा के जन्म पर महोत्सव मनते हैं और पुण्य क्षीण के जन्म पर कोई ताली बजाने भी नहीं आता है। संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया।
विज्ञापन