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डा. श्रीकांत भारद्वाज ने मरीजों के साथ की हिंदी की भी सेवा

Thu, 03 Sep 2020 11:27 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 03 Sep 2020 11:27 PM IST
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Dr. Srikant Bhardwaj also served Hindi with patients
डॉ श्रीकांत भारद्वाज - फोटो : BAGHPAT
डा. श्रीकांत भारद्वाज ने मरीजों के साथ की हिंदी की भी सेवा
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हिंदी हैं हम
70 साल तक लिखते रहे, 200 कहानियोें की रचना की, अब गाजियाबाद में रहता है उनका परिवार
अमर उजाला ब्यूरो
बागपत। रमाला क्षेत्र के किरठल गांव में मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. श्रीकांत भारद्वाज ने हिंदी की 70 साल तक सेवा की। पेशे से वह डॉक्टर थे, लेकिन उनका मन हमेशा हिंदी साहित्य साधना में ही रमा रहा। एक से बढ़कर एक साहित्य उन्होंने रचा और बड़े-बड़े साहित्यकारों ने उनकी सराहना की।
डॉ. श्रीकांत भारद्वाज का जन्म किरठल में 13 जुलाई 1925 को हुआ था। बचपन से ही वे रचनात्मक स्वभाव के थे। शुरुआती पढ़ाई गांव में हुई। देश में आजादी की अलख के साथ वह बड़े हुए। यही वजह है कि उनकी रचनाओं में राष्ट्रवाद की छाप दिखती है। डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय भेजा गया। जहां से उन्होंने बीएमएस की पढ़ाई की और वापस गांव लौटकर साहित्य साधना में जुट गए। करीब 70 साल तक लगातार लिखते रहे। साल 1993 में उन्हें दिनकर साहित्य पुरस्कार दिया गया। 11 जुलाई 2016 को उनका स्वर्गवास हो गया। उनके पुत्र डॉ. अरुण भारद्वाज अपने परिवार के साथ अब गाजियाबाद में रह रहे हैं।
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भारद्वाज जी की प्रमुख रचनाएं
महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, शिवाजी (महाकाव्य)। काव्य संग्रह कल्पना, ग्रामीण, गागर, आपातकाल, करुणा, यह किरठल है, तरंग, वीरबाला, राष्ट्रीय गीत। उपन्यास स्वतंत्रता सेनानी, क्रांति, भइया, लाल चार वारे आदि। नाटक इतिहास के प्रेरक प्रसंग। सिंहावलोकन प्रकाशित हुए। बाल साहित्य में फुलवारी, बाल गीत और इतिहास पर उनकी पुस्तक मेरा गांव, विभाजन और उसके बाद... पुस्तक को खूब सराहना मिल चुकी है। अंग्रेजी में उनके कविता संग्रह रैनबो को सराहा गया।
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डॉ. श्रीकांत भारद्वाज की एक रचना का अंश...
मंगल का तो व्रत रखें, करें अमंगल काम
आंख खोल कर देख, सब देख रहे हैं राम
देख रहे हैं रामभक्त तू कितना सच्चा
काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर का बच्चा
साहित्य में लीन रहते थे पिताजी : डॉ. अरुण कुमार
स्वर्गीय डॉ. श्रीकांत भारद्वाज के पुत्र डॉ. अरुण कुमार बताते हैं कि पिता जी साहित्य साधना में लीन रहते थे। 200 कहानियों की रचना की। खेल खिलाड़ियों और बच्चों से संबंधित भी खूब रचनाएं लिखीं।
आसान नहीं हिंदी में ऐसी साहित्य साधना
साहित्यकार बलवीर सिंह करुण का कहना है कि डॉ. श्रीकांत भारद्वाज ने कई हजार कविताएं लिखीं। हिंदी में उपन्यास लिखे और बड़े-बड़े साहित्यकारों ने उनकी सराहना की। ताउम्र गांव में रहने, डॉक्टरी पेशे के साथ इतनी बड़ी साहित्य साधना आसान काम नहीं है।

पंडित राधाकृष्णन का सानिध्य मिला
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीएमएस यानी आयुर्वेदाचार्य विद मॉडर्न मेडिसिन एंड सर्जरी की डिग्री ली थी। तब यह डिग्री छह साल की होती थी। बाद में इसका नाम बदलकर बीएएमएस कर दिया गया। पढ़ाई के दौरान उन्हें पंडित राधाकृष्णन का सानिध्य मिला। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन साल 1939 से 1948 तक यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे थे। इसी दौरान डॉ. श्रीकांत भारद्वाज ने पढ़ाई की थी।
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