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जैन अनुयायियों ने उत्तम अकिंचन्य धर्म का अंगीकार किया
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत
Updated Sun, 27 Sep 2015 12:54 AM IST
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बागपत के बड़ौत स्थित दशलक्षण महापर्व पर जैन अनुयायियों ने उत्तम अकिंचन्य धर्म को अंगीकार किया और मंदिरों में विधान के आयोजन किए गए।
शनिवार को सुबह से ही जैन मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। श्रद्धालुओं ने उत्तम अकिंचन्य धर्म की पूजा अर्चना की।
दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में आर्यिका प्रत्यक्षमति माता के सानिध्य में चल रहे तेरहद्वीप महामंडल विधान में सबसे पहले चंद्रप्रभु भगवान का अभिषेक किया गया।
इसके बाद नित्य नियम की पूजा की गई। पंडित नरेशचंद जैन शास्त्री के निर्देशन में पूजा संपन्न कराई गई। वहीं, दिगंबर जैन अतिथि भवन तथा दिगंबर जैन छोटा मंदिर में भगवान महावीर स्वामी एवं भगवान शांतिनाथ का विशेष पूजन और तत्वार्थ सूत्र की पूजाएं की गई।
इस अवसर पर अशोक कुमार जैन, सुदेश जैन, आनंद जैन, मनोज जैन, सुशील जैन, राजकुमार जैन, कमल जैन, अभिषेक जैन, रमेश जैन, अतुल जैन, सतीश जैन, अनिल जैन आदि उपस्थित रहे।
अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण पर्व के नौवें दिन छुल्लक ध्यान सागर महाराज के सानिध्य में चौसठ वृच्छि विधान का आयोजन किया गया। विधान का शुभारंभ भगवान की प्रतिमा पर जलाभिषेक कर किया गया। शांतिधारा का सौभाग्य नरेशचंद जैन, आशीष जैन को प्राप्त हुआ।
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कुबेर इंद्र का सौभाग्य पवन कुमार, हंस कुमार जैन को प्राप्त हुआ। नित्य नियम पूजन में विधानाचार्य पंडित तरशचंद जैन द्वारा पूजा कराई गई। विधान के मध्य पंडित तरशचंद द्वारा उत्तम अकिंचन्य धर्म के संबंध में विस्तार से बताया गया। विधान में अशोक जैन, वरदान जैन, अनिल जैन, जयप्रकाश जैन, प्रमोद जैन, संजीव जैन, त्रिस्ला जैन, इंद्राणी जैन आदि उपस्थित रहे।
भक्ति संध्या में वरदान जैन, अनिल जैन, राकेश जैन, हिमांशु, जयप्रकाश, विनोद, नरेंद्र राजकमल, राजेश भारती, सचिन गुप्ता, सोहन वर्मा आदि उपस्थित रहे।
उत्तम अकिंचन्य व्रत धारण करें
बड़ौत। अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में छुल्लक ध्यान सागर महाराज ने कहा कि उत्तम अकिंचन्य व्रत धारण करें। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने 24 प्रकार के परिग्रहों का त्याग कर दिया है। वो ही परम समाधि अर्थात मोक्ष सुख पाने का हकदार है।
अभी मुझे बहुत जीना है
बड़ौत। जैन अतिथि भवन में धर्मसभा में आर्यिका प्रत्यक्षमति माता ने कहा कि प्रथम सत्य ही अंतिम सत्य है। मनुष्य प्रथम सत्य को भूल जाता है। इसलिए परमात्मा को प्राप्त नहीं कर पाता। उन्होंने बताया कि प्रथम सत्य यह है कि मनुष्य संसार में नग्न आया है।
अंतिम सत्य यह है कि यहां से मनुष्य नग्न ही जाएगा। उन्होंने कहा कि मनुष्य को इस प्रकार के विचार मन में लाने चाहिए कि मै अमर हूं, अजर हूं। अभी मुझे बहुत जीना है।
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शनिवार को सुबह से ही जैन मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। श्रद्धालुओं ने उत्तम अकिंचन्य धर्म की पूजा अर्चना की।
दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में आर्यिका प्रत्यक्षमति माता के सानिध्य में चल रहे तेरहद्वीप महामंडल विधान में सबसे पहले चंद्रप्रभु भगवान का अभिषेक किया गया।
इसके बाद नित्य नियम की पूजा की गई। पंडित नरेशचंद जैन शास्त्री के निर्देशन में पूजा संपन्न कराई गई। वहीं, दिगंबर जैन अतिथि भवन तथा दिगंबर जैन छोटा मंदिर में भगवान महावीर स्वामी एवं भगवान शांतिनाथ का विशेष पूजन और तत्वार्थ सूत्र की पूजाएं की गई।
इस अवसर पर अशोक कुमार जैन, सुदेश जैन, आनंद जैन, मनोज जैन, सुशील जैन, राजकुमार जैन, कमल जैन, अभिषेक जैन, रमेश जैन, अतुल जैन, सतीश जैन, अनिल जैन आदि उपस्थित रहे।
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अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण पर्व के नौवें दिन छुल्लक ध्यान सागर महाराज के सानिध्य में चौसठ वृच्छि विधान का आयोजन किया गया। विधान का शुभारंभ भगवान की प्रतिमा पर जलाभिषेक कर किया गया। शांतिधारा का सौभाग्य नरेशचंद जैन, आशीष जैन को प्राप्त हुआ।
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कुबेर इंद्र का सौभाग्य पवन कुमार, हंस कुमार जैन को प्राप्त हुआ। नित्य नियम पूजन में विधानाचार्य पंडित तरशचंद जैन द्वारा पूजा कराई गई। विधान के मध्य पंडित तरशचंद द्वारा उत्तम अकिंचन्य धर्म के संबंध में विस्तार से बताया गया। विधान में अशोक जैन, वरदान जैन, अनिल जैन, जयप्रकाश जैन, प्रमोद जैन, संजीव जैन, त्रिस्ला जैन, इंद्राणी जैन आदि उपस्थित रहे।
भक्ति संध्या में वरदान जैन, अनिल जैन, राकेश जैन, हिमांशु, जयप्रकाश, विनोद, नरेंद्र राजकमल, राजेश भारती, सचिन गुप्ता, सोहन वर्मा आदि उपस्थित रहे।
उत्तम अकिंचन्य व्रत धारण करें
बड़ौत। अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में छुल्लक ध्यान सागर महाराज ने कहा कि उत्तम अकिंचन्य व्रत धारण करें। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति ने 24 प्रकार के परिग्रहों का त्याग कर दिया है। वो ही परम समाधि अर्थात मोक्ष सुख पाने का हकदार है।
अभी मुझे बहुत जीना है
बड़ौत। जैन अतिथि भवन में धर्मसभा में आर्यिका प्रत्यक्षमति माता ने कहा कि प्रथम सत्य ही अंतिम सत्य है। मनुष्य प्रथम सत्य को भूल जाता है। इसलिए परमात्मा को प्राप्त नहीं कर पाता। उन्होंने बताया कि प्रथम सत्य यह है कि मनुष्य संसार में नग्न आया है।
अंतिम सत्य यह है कि यहां से मनुष्य नग्न ही जाएगा। उन्होंने कहा कि मनुष्य को इस प्रकार के विचार मन में लाने चाहिए कि मै अमर हूं, अजर हूं। अभी मुझे बहुत जीना है।