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चौगामा नहर का निर्माण अधूरा, कब आएगा कोई भगीरथ

Tue, 13 Mar 2018 01:00 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत
ब्यूरो/अमर उजाला, बागपत Updated Tue, 13 Mar 2018 01:00 AM IST
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Construction of Chaugamma Canal incomplete
सूखी पड़ी चौगामा नहर। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
चौगामा नहर का आधा-अधूरा निर्माण किसानों के लिए मुसीबत बन गया है। पिछले 53 साल से मांग चली आ रही है। कई बार निर्माण कार्य शुरू हो चुका है, लेकिन इसे बीच में ही रोक दिया गया। गर्मी में इस क्षेत्र के किसान अधिक परेशानी झेलते हैं। किसानों का कहना है कि समस्या पर कभी ध्यान नहीं दिया गया।
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मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना से सटे बागपत के चौगामा क्षेत्र में पेयजल ही नहीं बल्कि सिंचाई के पानी की भी किल्लत है। यहां के किसानों ने 1965 में चौगामा नहर के निर्माण की मांग रखी। आंदोलन शुरू हुए तो तत्कालीन सिंचाई मंत्री ने 1978 में बुढ़ाना में शिलान्यास किया। लेकिन इतने साल बाद भी हालात नहीं बदले। दोघट के मास्टर रण सिंह पंवार का कहना है कि चौगामा नहर बरसाती नाले जैसी बन गई है।
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नहर में एक जुलाई से लेकर 10 अक्तूबर तक पानी छोडने का प्रावधान है, जबकि यहां पानी की जरूरत मार्च से लेकर जुलाई माह तक है। टीकरी के संजीव राठी का कहना है कि चौगामा नहर को रेगुलर नहर बनाया लाना चाहिए। जब तक चौगामा का जल स्तर स्थायी रूप से न रुक जाए, तब तक इसमें पानी चलाया जाए।
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मुलसम के ब्रह्मचारी आर्य का कहना है कि नहर तो बन गई। क्षेत्रवासियों ने आवश्यकता अनुसार नहर में फ्री भूमि भी दे दी। किसानों को जमीन का मुआवजा तक नहीं मिला। किसानों को आज तक नहर का कोई फायदा नहीं मिला।

तेजपाल सिंह ठेकेदार का कहना है कि खेतों की सिंचाई के लिए नहर में गूल बनाई जाए। अभी तक नहर में एक भी गूल नहीं बनी है। निर्माण कार्य अधूरा है। नहर का निर्माण कार्य पूरा कराकर, इसे रेगुलर नहर बनाया जाना चाहिए।

फाइलों में बनती और बहती रही नहर
बागपत। सितंबर 1978 में तत्कालीन सिंचाई मंत्री ठाकुर बलबीर सिंह ने बुढ़ाना में इस नहर का शिलान्यास किया था। उस समय हिंडन व कृष्णा नदी में पंप सेट से पानी उठाकर इस नहर में पानी डालने का प्रावधान था।

उस समय इस परियोजना पर 6.42 करोड़ रुपये खर्च होने थे। तीन वर्ष तक इसका निर्माण कार्य चला। बुढ़ाना में हिंडन नदी पर चेक डेम बनाया जा रहा था, लेकिन हिंडन व कृष्णा नदियों में पानी की कमी को देखते हुए यह परियोजना 1982 में स्थगित कर दी गई और इस पर खर्च हुए करोड़ों रुपये बर्बाद हो गए।

30 जून 1985 को कांग्रेस नेता सत्यप्रकाश राणा के प्रयास से इस नहर परियोजना को दोबारा स्वीकृति मिली और तत्कालीन सिंचाई मंत्री वीर बहादुर सिंह ने दाहा में सभा कर नहर का निर्माण कार्य शुरू कराने की घोषणा की।

इस योजना को हिंडन व कृष्णा नदियों से हटाकर कल्लरपुर रजबाहे के माध्यम से इसमें पानी देने का प्राविधान रखा गया और इस 33.36 करोड़ रुपये खर्च करने का बजट रखा गया। इस पर निर्माण कार्य शुरू हुआ, लेकिन धन अभाव के कारण इस पर कार्य धीमा चलता रहा।

नहर के लिए कई बार आंदोलन
बागपत। नहर के लिए कई बार आंदोलन किए गए। वर्ष 1965 में दोघट निवासी किसान राज्जू ने घोषणा की थी कि जब तक चौगामा नहर नहीं बनेगी, वह स्नान नहीं करेगा। उसने मरते दम तक स्नान नहीं किया, लेकिन पानी भी नहीं आया।

नरेंद्र राणा के नेतृत्व में नहर में पानी छोड़ने, निर्माण पूरा कराने और गुलाबे बनाने के लिए बुढ़ाना के बायावाला पर धरना दिया। राणा ने 2013 में मेरठ से लखनऊ तक पद यात्रा की थी और धरना दिया। उस समय नहर के लिए साढ़े 4 करोड़ रुपये स्वीकृत कर दिए थे। विभाग ने ढाई करोड़ नहर पर खर्च कर दिए थे और दो करोड़ वापस भेजे थे।

चौगामा नहर संघर्ष समिति का निर्माण 1990 मेें किया गया था। समिति के अध्यक्ष पीतम सिंह मलिक बनाए गए थे। बुढ़ाना तहसील में दो साल तक धरना चला। 1993 में चौ. अजित सिंह के प्रयास से जल आयोग से नहर को स्वीकृति मिली। केंद्रीय जल आयोग ने यूपी को 42 करोड़ रुपये दिए थे । 

कागजों में कर दिया निर्माण पूरा
बागपत। 2004 में सरकारी कागजों में चौगामा नहर का निर्माण पूरा हो गया। विधिवत रूप से तत्कालीन सिंचाई मंत्री अनुराधा ने लोई और दाहा में नहर का उद्घाटन कर दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि गड़बड़ी की गई है, जिसकी उच्च स्तरीय जांच जरूरी है।

जलस्तर बन सकता है मुसीबत
बागपत। चौगामा नहर बनाने की मांग 1965 में उठी थी। क्योंकि यहां का जल स्तर सबसे नीचे था और पानी की बड़ी समस्या थी। खेतों की सिंचाई नहीं होती थी और पैदावार बहुत कम होती थी। 1978 में चौगामा क्षेत्र का जल स्तर 40 फीट गहरा था।


क्षेत्र में हर वर्ष 70 सेंटी मीटर जल स्तर घट रहा है। अब स्थिति यह हो गई है कि जल स्तर 220 फीट गहरा पहुंच गया है। ऊपरी सतह सब जल विहीन हो गई। अगर यहीं हाल रहा था आने वाले समय में यहां जल संकट पैदा हो जाएगा।
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