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मां मंशा देवी मंदिर में सभी कष्ट होते हैं दूर
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बडागांव का प्राचीन मां मंशा देवी मंदिर
- फोटो : KAHKRA
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खेकड़ा। बड़ागांव स्थित प्रसिद्ध मां मंशा देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा और आस्था है। दूर-दूर से श्रद्धालु देवी के दर्शन कर कष्टों से निदान पाते हैं।
खेकड़ा क्षेत्र के रावण उर्फ बड़ागांव में स्थित मां मंशा देवी का मंदिर प्राचीन कालीन है। मंदिर क्षेत्र प्रदेश ही नहीं अपितु विभिन्न प्रांतों में अपने दैवीय चमत्कार के लिए प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश की पावन धरा पर प्राचीन काल से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का उद्गम स्थल रहा है। बागपत से 15 किमी दूरी पर खेकड़ा के समीप बड़ागांव है। जहां प्राचीन मनोकामना सिद्ध मां मंशा देवी मंदिर है। कोई भक्त सच्चे मन से पूजा आराधना कर तो मंशा देवी उसकी मनोकामना अवश्य पूरी करती है।
प्राचीन समय की बात है। मां मंशा देवी की मूर्ति हिमालय से रावण द्वारा लाई जा रही थी। मूर्ति को उठाते समय हिमालय पर आकाशवाणी हुई कि हे रावण यदि तूने इस मूर्ति को किसी स्थान पर रख दिया तो वहां से उठाना तेरे बस से बाहर होगा। रावण मूर्ति को हिमालय से लेकर जैसे ही बड़ागांव में प्रवेश करने लगा।
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महामाई की माया का अद्भुत चमत्कार हुआ। रावण भूख से व्याकुल होने लगा तभी उसे एक ग्वाला दिखाई दिया। रावण ने ग्वाले को मूर्ति दे दी। उससे वह संभल ना सका और मां मंशा देवी बड़ागांव की भूमि पर विराजमान हो गई। रावण के लाख कोशिश करने पर भी मूर्ति टस से मस नहीं हो सकी। तभी से बड़ागांव का नाम रावण उर्फ बड़ागांव पड़ गया। मां मंशा देवी मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की मूर्ति विशेषज्ञों के अनुसार सातवीं सदी की है। इसके अलावा राधा कृष्ण, सीता राम, हनुमान और शिव परिवार के मंदिर यहां पर बने हैं।
मां मंशा देवी का दैवीय चमत्कार
मां मंशा देवी मंदिर कमेेटी के अध्यक्ष राजपाल त्यागी, प्रदीप त्यागी ने बताया कि अंग्रेजों के समय नमक कानून के आरोपी लक्ष्मण सेठ को अंग्रेजों ने तोप से उड़ाने का हुक्म दिया। लक्ष्मण सेठ मां मंशा देवी के सच्चे भक्त थे। उन्होंने मां से अरदास लगाई कि हे मां इस कलंक को मेरे माथे से मिटा दे, तो मैं तेरा एक सुंदर सा भवन निर्माण करूंगा। अंग्रेजों ने उसे तोप के आगे खड़ा कर गोला दागा, लेकिन गोला ठंडा हो गया। अंग्रेजों ने ऐसा तीन बार किया। तीनों ही बार गोला ठंडा हो गया। अंग्रेजों ने लक्ष्मण सेठ से पूछा यह क्या चमत्कार है। सेठ ने कहा कि मुझे दिखाई देता है। कि पीले वस्त्रों वाली एक छोटी सी कन्या तोप के सामने हाथ उठाए खड़ी हैं। अंग्रेजों ने श्रद्धा के वशीभूत होकर सेठ को बरी कर दिया। लक्ष्मण सेठ ने मां का भवन निर्माण कराया। ऐसी अनेक सत्य घटना है। जिसका वर्णन बुजुर्ग ग्रामीण सुनाते रहते हैं।
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खेकड़ा क्षेत्र के रावण उर्फ बड़ागांव में स्थित मां मंशा देवी का मंदिर प्राचीन कालीन है। मंदिर क्षेत्र प्रदेश ही नहीं अपितु विभिन्न प्रांतों में अपने दैवीय चमत्कार के लिए प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश की पावन धरा पर प्राचीन काल से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का उद्गम स्थल रहा है। बागपत से 15 किमी दूरी पर खेकड़ा के समीप बड़ागांव है। जहां प्राचीन मनोकामना सिद्ध मां मंशा देवी मंदिर है। कोई भक्त सच्चे मन से पूजा आराधना कर तो मंशा देवी उसकी मनोकामना अवश्य पूरी करती है।
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प्राचीन समय की बात है। मां मंशा देवी की मूर्ति हिमालय से रावण द्वारा लाई जा रही थी। मूर्ति को उठाते समय हिमालय पर आकाशवाणी हुई कि हे रावण यदि तूने इस मूर्ति को किसी स्थान पर रख दिया तो वहां से उठाना तेरे बस से बाहर होगा। रावण मूर्ति को हिमालय से लेकर जैसे ही बड़ागांव में प्रवेश करने लगा।
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महामाई की माया का अद्भुत चमत्कार हुआ। रावण भूख से व्याकुल होने लगा तभी उसे एक ग्वाला दिखाई दिया। रावण ने ग्वाले को मूर्ति दे दी। उससे वह संभल ना सका और मां मंशा देवी बड़ागांव की भूमि पर विराजमान हो गई। रावण के लाख कोशिश करने पर भी मूर्ति टस से मस नहीं हो सकी। तभी से बड़ागांव का नाम रावण उर्फ बड़ागांव पड़ गया। मां मंशा देवी मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की मूर्ति विशेषज्ञों के अनुसार सातवीं सदी की है। इसके अलावा राधा कृष्ण, सीता राम, हनुमान और शिव परिवार के मंदिर यहां पर बने हैं।
मां मंशा देवी का दैवीय चमत्कार
मां मंशा देवी मंदिर कमेेटी के अध्यक्ष राजपाल त्यागी, प्रदीप त्यागी ने बताया कि अंग्रेजों के समय नमक कानून के आरोपी लक्ष्मण सेठ को अंग्रेजों ने तोप से उड़ाने का हुक्म दिया। लक्ष्मण सेठ मां मंशा देवी के सच्चे भक्त थे। उन्होंने मां से अरदास लगाई कि हे मां इस कलंक को मेरे माथे से मिटा दे, तो मैं तेरा एक सुंदर सा भवन निर्माण करूंगा। अंग्रेजों ने उसे तोप के आगे खड़ा कर गोला दागा, लेकिन गोला ठंडा हो गया। अंग्रेजों ने ऐसा तीन बार किया। तीनों ही बार गोला ठंडा हो गया। अंग्रेजों ने लक्ष्मण सेठ से पूछा यह क्या चमत्कार है। सेठ ने कहा कि मुझे दिखाई देता है। कि पीले वस्त्रों वाली एक छोटी सी कन्या तोप के सामने हाथ उठाए खड़ी हैं। अंग्रेजों ने श्रद्धा के वशीभूत होकर सेठ को बरी कर दिया। लक्ष्मण सेठ ने मां का भवन निर्माण कराया। ऐसी अनेक सत्य घटना है। जिसका वर्णन बुजुर्ग ग्रामीण सुनाते रहते हैं।