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परशुराम की तपोभूमि हैं पुरा महादेव
Updated Fri, 21 Jul 2017 01:31 AM IST
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आज लाखों शिवभक्त पुरा महादेव मंदिर में करेंगे जलाभिषेक
-भगवान परशुराम की तपोभूमि है पुरा महादेव, कभी था कजरी वन
- शिवलिंग स्थापना को लेकर भी यहां कई कथाएं प्रचलित
बागपत। जिले के पुरा गांव के जिस परशुरामेश्वर मंदिर में शिवरात्रि पर लाखों शिवभक्त जलाभिषेक करेंगे। वह स्थान परशुराम की तपोभूमि रहा है। यही नहीं, कभी यहां कजरी वन था। कहा जाता है कि ऋषि जमदग्नि अपनी पत्नी रेणुका के साथ आश्रम में रहते थे। एक बार राजा सहस्त्रबाहु शिकार खेलते हुए कजरी वन से गुजरे। रात के समय वह ऋषि जमदग्नि के आश्रम पहुंचे। ऋषि मौजूद नहीं थे, उनकी पत्नी रेणुका ने कामधेनू गाय की कृपा से राजा का आदर सत्कार कर राजसी व्यंजन खिलाए। इससे राजा बहुत ही प्रभावित हुए।
बताते हैं कि सहस्त्रबाह ने रेणुका से कामधेनु गाय अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई। मना करने पर राजा जबरदस्ती कामधेनु को ले जाने लगे। लेकिन सफल नहीं हुए। राजा गुस्से में आकर रेणुका को ही बलपूर्वक अपने साथ हस्तिनापुर ले गए और वहां एक कमरे में बंद कर दिया। जब ऋषि जमदग्नि आश्रम पहुंचे तो उन्हें रेणुका नहीं मिली। उधर, राजा सहस्रबाहु की अनुपस्थिति में रानी ने रेणुका को बंधन मुक्त कर दिया।
बंधनमुक्त होकर रेणुका आश्रम पहुंची और ऋषि को पूरा मामला बताया। इस पर ऋषि राजा के प्रति गुस्से मे भर गया। यही नहीं उसने रेणुका को भी अपने साथ रखने से मना कर दिया। तर्क दिया कि वह पर पुरूष के यहां एक रात ठहर कर आई। ऋषि की दृष्टि में वह अपवित्र हो गई थी। इस पर रेणुका ने प्रार्थना की वह आश्रम छोड़कर अन्य कहीं नहीं जाएगी। चाहे तो वह उसका सिर काट दें। गुस्साए ऋषि ने अपनी पत्नी का सिर काटने के लिए अपने पुत्रों को बुलाया। पहले तीन पुत्रों ने ऐसा करने से मना कर दिया। ऋषि ने उन्हें श्राप देकर पत्थर बना दिया। इसके बाद चौथे पुत्र राम को बुलाकर रेणुका का सिर काटने का आदेश दिया। राम पितृ भक्त था। उसने अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दिया।
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मां का सिर धड़ से अलग करने पर राम को पश्चाताप हुआ। इसके बाद वह कुछ दूर जाकर शिवलिंग बनाकर घोर तप करने लगा। घोर तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उसे साक्षात दर्शन दिए और वर मांगने के लिए कहा। राम ने भगवान शिव से माता के जीवन की मांग की। शिव ने प्रसन्न होकर एक परशु (फरसा) भी दिया तथा कहा कि यह परशु युद्ध में तुम्हारी विजय करेगा।
भगवान शिव की ओर से दिए गए परशु (फरसे ) के बाद उन्हें परशुराम के नाम से जाना गया, वही उनकी माता रेणुका को भी जीवनदान मिल गया। परशुराम ने जो शिवलिंग बनाया था वही पुरा गांव में है। इस पर शिवभक्त जलाभिषेक करते हैं।
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ऐसे हुआ मंदिर का निर्माण
कथा प्रचलित है कि काफी दिनों तक मंदिर खंडहर मे तब्दील रहा। एक दिन लंढौरा के राजा रामदयाल की पत्नी इधर घूमने आयी तो उसका हाथी यहा आकर बैठ गया। काफी प्रयास के बाद भी हाथी नहीं उठा तो रानी ने अपने सैनिकों को यह जगह खोदने का आदेश दिया। खोदने पर वहां एक शिवलिंग प्रकट हुआ तब रानी ने वहां मंदिर का निर्माण कराया। यहीं पर जलाभिषेक किया जाता है।
क्या कहते हैं मंदिर समिति के पदाधिकारी
मंदिर समिति के उपाध्यक्ष एडवोकेट सुरेंद्र यादव बताते हैं कि इसी जगह पर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी कृष्ण बोधाश्रम ने भी तपस्या की थी । मंदिर को जगद्गुरु शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने ही परशुरामेशवर महादेव मंदिर नाम दिया है।
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शिवलिंग स्थापना की यह कथा भी सुनिए
बागपत। परशुरामेश्वर महादेव मंदिर की मान्यता भगवान शंकर के ज्योतिर्लिंगों की ही तरह है। मंदिर परिसर में ही रहने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक राजपाल शर्मा बताते हैं कि भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की तपस्या करते समय राजा सहस्रबाहु के पुत्रों ने हत्या कर दी थी। इसके बाद परशुराम ने इसी स्थान पर तपस्या की। किसी ऋषि ने उनसे कहा कि यह स्थान अब अपवित्र हो गया है। इसलिए भगवान शिव की प्रतिमूर्ति शिवलिंग की स्थापना से ही इस जगह को पवित्र किया जा सकता है। तब परशुराम हरिद्वार गए और वहां मां गंगा की गोद में पड़े सैकड़ों पत्थरों और चट्टानों में से एक पत्थर को पुरा (तब कजरी वन) लाने की प्रार्थना की। लेकिन सबने मां गंगा को छोड़कर आने से मना कर दिया। तब भगवान परशुराम ने कहा कि एक वर्ष में दो बार फाल्गुन माह और श्रावण माह में भविष्य की पीढ़ियां तुम्हें गंगाजल में नहलाएंगी। जो ऐसा नहीं करेगा उसकी यात्रा सफल नहीं होगी। इसके बाद परशुराम ने यहां शिवलिंग की स्थापना की। इसलिए यहां कांवड़िये जलाभिषेक करते हैं।
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-भगवान परशुराम की तपोभूमि है पुरा महादेव, कभी था कजरी वन
- शिवलिंग स्थापना को लेकर भी यहां कई कथाएं प्रचलित
बागपत। जिले के पुरा गांव के जिस परशुरामेश्वर मंदिर में शिवरात्रि पर लाखों शिवभक्त जलाभिषेक करेंगे। वह स्थान परशुराम की तपोभूमि रहा है। यही नहीं, कभी यहां कजरी वन था। कहा जाता है कि ऋषि जमदग्नि अपनी पत्नी रेणुका के साथ आश्रम में रहते थे। एक बार राजा सहस्त्रबाहु शिकार खेलते हुए कजरी वन से गुजरे। रात के समय वह ऋषि जमदग्नि के आश्रम पहुंचे। ऋषि मौजूद नहीं थे, उनकी पत्नी रेणुका ने कामधेनू गाय की कृपा से राजा का आदर सत्कार कर राजसी व्यंजन खिलाए। इससे राजा बहुत ही प्रभावित हुए।
बताते हैं कि सहस्त्रबाह ने रेणुका से कामधेनु गाय अपने साथ ले जाने की इच्छा जताई। मना करने पर राजा जबरदस्ती कामधेनु को ले जाने लगे। लेकिन सफल नहीं हुए। राजा गुस्से में आकर रेणुका को ही बलपूर्वक अपने साथ हस्तिनापुर ले गए और वहां एक कमरे में बंद कर दिया। जब ऋषि जमदग्नि आश्रम पहुंचे तो उन्हें रेणुका नहीं मिली। उधर, राजा सहस्रबाहु की अनुपस्थिति में रानी ने रेणुका को बंधन मुक्त कर दिया।
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बंधनमुक्त होकर रेणुका आश्रम पहुंची और ऋषि को पूरा मामला बताया। इस पर ऋषि राजा के प्रति गुस्से मे भर गया। यही नहीं उसने रेणुका को भी अपने साथ रखने से मना कर दिया। तर्क दिया कि वह पर पुरूष के यहां एक रात ठहर कर आई। ऋषि की दृष्टि में वह अपवित्र हो गई थी। इस पर रेणुका ने प्रार्थना की वह आश्रम छोड़कर अन्य कहीं नहीं जाएगी। चाहे तो वह उसका सिर काट दें। गुस्साए ऋषि ने अपनी पत्नी का सिर काटने के लिए अपने पुत्रों को बुलाया। पहले तीन पुत्रों ने ऐसा करने से मना कर दिया। ऋषि ने उन्हें श्राप देकर पत्थर बना दिया। इसके बाद चौथे पुत्र राम को बुलाकर रेणुका का सिर काटने का आदेश दिया। राम पितृ भक्त था। उसने अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दिया।
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मां का सिर धड़ से अलग करने पर राम को पश्चाताप हुआ। इसके बाद वह कुछ दूर जाकर शिवलिंग बनाकर घोर तप करने लगा। घोर तपस्या से खुश होकर भगवान शिव ने उसे साक्षात दर्शन दिए और वर मांगने के लिए कहा। राम ने भगवान शिव से माता के जीवन की मांग की। शिव ने प्रसन्न होकर एक परशु (फरसा) भी दिया तथा कहा कि यह परशु युद्ध में तुम्हारी विजय करेगा।
भगवान शिव की ओर से दिए गए परशु (फरसे ) के बाद उन्हें परशुराम के नाम से जाना गया, वही उनकी माता रेणुका को भी जीवनदान मिल गया। परशुराम ने जो शिवलिंग बनाया था वही पुरा गांव में है। इस पर शिवभक्त जलाभिषेक करते हैं।
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ऐसे हुआ मंदिर का निर्माण
कथा प्रचलित है कि काफी दिनों तक मंदिर खंडहर मे तब्दील रहा। एक दिन लंढौरा के राजा रामदयाल की पत्नी इधर घूमने आयी तो उसका हाथी यहा आकर बैठ गया। काफी प्रयास के बाद भी हाथी नहीं उठा तो रानी ने अपने सैनिकों को यह जगह खोदने का आदेश दिया। खोदने पर वहां एक शिवलिंग प्रकट हुआ तब रानी ने वहां मंदिर का निर्माण कराया। यहीं पर जलाभिषेक किया जाता है।
क्या कहते हैं मंदिर समिति के पदाधिकारी
मंदिर समिति के उपाध्यक्ष एडवोकेट सुरेंद्र यादव बताते हैं कि इसी जगह पर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी कृष्ण बोधाश्रम ने भी तपस्या की थी । मंदिर को जगद्गुरु शंकराचार्य माधवाश्रम जी महाराज ने ही परशुरामेशवर महादेव मंदिर नाम दिया है।
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शिवलिंग स्थापना की यह कथा भी सुनिए
बागपत। परशुरामेश्वर महादेव मंदिर की मान्यता भगवान शंकर के ज्योतिर्लिंगों की ही तरह है। मंदिर परिसर में ही रहने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक राजपाल शर्मा बताते हैं कि भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि की तपस्या करते समय राजा सहस्रबाहु के पुत्रों ने हत्या कर दी थी। इसके बाद परशुराम ने इसी स्थान पर तपस्या की। किसी ऋषि ने उनसे कहा कि यह स्थान अब अपवित्र हो गया है। इसलिए भगवान शिव की प्रतिमूर्ति शिवलिंग की स्थापना से ही इस जगह को पवित्र किया जा सकता है। तब परशुराम हरिद्वार गए और वहां मां गंगा की गोद में पड़े सैकड़ों पत्थरों और चट्टानों में से एक पत्थर को पुरा (तब कजरी वन) लाने की प्रार्थना की। लेकिन सबने मां गंगा को छोड़कर आने से मना कर दिया। तब भगवान परशुराम ने कहा कि एक वर्ष में दो बार फाल्गुन माह और श्रावण माह में भविष्य की पीढ़ियां तुम्हें गंगाजल में नहलाएंगी। जो ऐसा नहीं करेगा उसकी यात्रा सफल नहीं होगी। इसके बाद परशुराम ने यहां शिवलिंग की स्थापना की। इसलिए यहां कांवड़िये जलाभिषेक करते हैं।