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गणतन्त्र दिवस पर बांटे जाते थे बताशे
Updated Fri, 26 Jan 2018 01:29 AM IST
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बड़ौत (बागपत)।
गणतंत्र दिवस नजदीक आ गया है, लेकिन इसको लेकर अब पहले जैसा उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है। दूसरी तरफ बुजुर्गों ने कहा पहले गणतंत्र दिवस पर बच्चों, बूढ़ों सहित हर वर्ग के लोगों को बताशे बांटे जाते थे।
छपरौली के धर्मवीर सिंह शास्त्री पूर्व प्रधानाचार्य इंटर कॉलेज छपरौली (101) ने कहा पहले ग्रामीण क्षेत्रों में न अखबार था न ही टीवी थे। लोग आपस में चर्चा करते थे कि आज प्रधानमंत्री ने झंडा फहराया है। जब टेलीविजन आया तो कॉलेज में सैकड़ों लोगों ने गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम देखा। पहले लोगों में गणतंत्र दिवस को लेकर उत्साह रहता था, लेकिन अब उत्साह खत्म होता जा रहा है। कमला देवी पत्नी जगदीश निवासी तिलवाडा ( 82) ने कहा पहली जनवरी से ही लोग गणतंत्र दिवस की चर्चाएं करने लगते थे। प्रभात रैली निकाली जाती थी। गणतंत्र दिवस के दिन बताशे बटते थे। शाम के समय बडे़ और बच्चे बैठे जाते थे और नेताजी सुभाषचंद बोस, भगत सिंह, महात्मा गांधी, हिंदुस्तान और पाकिस्तान की चर्चा करते थे। यह सिलसिला महीनों चलता था। वर्तमान समय में संसाधन तो हैं, लेकिन राष्ट्रीय त्योहार का पहले जैसा उत्साह नहीं है। मास्टर यशपाल सिंह पुत्र दरियाव सिंह ( 86) ने कहा पहले लोग अपने धार्मिक त्योहार से ज्यादा महत्व राष्ट्रीय त्योहार को देते थे, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं है।
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गणतंत्र दिवस नजदीक आ गया है, लेकिन इसको लेकर अब पहले जैसा उत्साह नहीं दिखाई दे रहा है। दूसरी तरफ बुजुर्गों ने कहा पहले गणतंत्र दिवस पर बच्चों, बूढ़ों सहित हर वर्ग के लोगों को बताशे बांटे जाते थे।
छपरौली के धर्मवीर सिंह शास्त्री पूर्व प्रधानाचार्य इंटर कॉलेज छपरौली (101) ने कहा पहले ग्रामीण क्षेत्रों में न अखबार था न ही टीवी थे। लोग आपस में चर्चा करते थे कि आज प्रधानमंत्री ने झंडा फहराया है। जब टेलीविजन आया तो कॉलेज में सैकड़ों लोगों ने गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम देखा। पहले लोगों में गणतंत्र दिवस को लेकर उत्साह रहता था, लेकिन अब उत्साह खत्म होता जा रहा है। कमला देवी पत्नी जगदीश निवासी तिलवाडा ( 82) ने कहा पहली जनवरी से ही लोग गणतंत्र दिवस की चर्चाएं करने लगते थे। प्रभात रैली निकाली जाती थी। गणतंत्र दिवस के दिन बताशे बटते थे। शाम के समय बडे़ और बच्चे बैठे जाते थे और नेताजी सुभाषचंद बोस, भगत सिंह, महात्मा गांधी, हिंदुस्तान और पाकिस्तान की चर्चा करते थे। यह सिलसिला महीनों चलता था। वर्तमान समय में संसाधन तो हैं, लेकिन राष्ट्रीय त्योहार का पहले जैसा उत्साह नहीं है। मास्टर यशपाल सिंह पुत्र दरियाव सिंह ( 86) ने कहा पहले लोग अपने धार्मिक त्योहार से ज्यादा महत्व राष्ट्रीय त्योहार को देते थे, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं है।
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