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सिनौली के कब्रगाह में ही पकाए जाते थे बर्तन, दूसरी भट्टी मिली
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बड़ौत (बागपत)। सिनौली के उत्खनन में रोज नए सवाल सामने आ रहे हैं। उत्खनन केंद्र से दूसरी बार भट्टी निकली है। संभावना है कि भट्टी को मिट्टी के बर्तन पकाने के काम में लिया जाता रहा होगा। इसकी एक वजह यह भी है कि मानव कंकाल और हड़प्पा कालीन कब्रों के आसपास बहुतायत में मिट्टी के बर्तन मिले हैं। संभावना है कि कब्रगाह स्थल पर ही मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए भट्टी लगवाई गई होगी।
पिछले 13 साल में सिनौली में तीसरी बार उत्खनन का कार्य किया जा रहा है। साल 2006 में हुई पहले चरण की खुदाई में एक भट्टी निकली थी। करीब छह फुट लंबाई की इस भट्टी के प्रयोग को लेकर तभी से सवाल उठ रहे हैं। तीसरे चरण की खुदाई में फिर भट्टी निकली है। हड़प्पा कालीन साइट पर मिले कंकाल के पास बहुतायत में मिट्टी के बर्तन रखे जाने का चलन था। अलग-अलग आकार के बर्तन रखे जाते थे। मृतक की पसंद का इनमें ख्याल रखे जाने की परंपरा का भी अनुमान है। भट्टी मिलने से संभावना है कि बर्तनों को कब्रगाह स्थल पर ही पकाए जाते रहे होंगे।
अंतिम संस्कार या अग्नि पूजा में होती थी प्रयोग
बड़ौत। भट्टी दो नए सवाल भी खड़े कर रही हैं। अंतिम संस्कार की कहीं दो विधियां तो नहीं थी। एक दफनाने की और दूसरी इस तरह की भट्टी में जलाने की, लेकिन इस पर विस्तृत शोध करने की जरूरत है। हड़प्पा काल में मनुष्य प्रकृति के बेहद निकट था। अनुमान यह भी है कि कहीं कब्रगाह स्थल के पास अग्नि की पूजा की जाती रही होगी।
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हर बार मिले हैं मनके, बनती थी माला
बड़ौत। हड़प्पा कालीन उत्खनन केंद्रों पर कब्र और कंकाल के पास हर जगह मनके मिले हैं। सिनौली में पहले और दूसरे चरण की खुदाई में भी बड़ी संख्या में मनके मिले थे। इन्हें माला में प्रयोग किया जाता था। अंतिम संस्कार में मृतक के पास ही इन्हें छोड़ दिया जाता रहा होगा।
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पिछले 13 साल में सिनौली में तीसरी बार उत्खनन का कार्य किया जा रहा है। साल 2006 में हुई पहले चरण की खुदाई में एक भट्टी निकली थी। करीब छह फुट लंबाई की इस भट्टी के प्रयोग को लेकर तभी से सवाल उठ रहे हैं। तीसरे चरण की खुदाई में फिर भट्टी निकली है। हड़प्पा कालीन साइट पर मिले कंकाल के पास बहुतायत में मिट्टी के बर्तन रखे जाने का चलन था। अलग-अलग आकार के बर्तन रखे जाते थे। मृतक की पसंद का इनमें ख्याल रखे जाने की परंपरा का भी अनुमान है। भट्टी मिलने से संभावना है कि बर्तनों को कब्रगाह स्थल पर ही पकाए जाते रहे होंगे।
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अंतिम संस्कार या अग्नि पूजा में होती थी प्रयोग
बड़ौत। भट्टी दो नए सवाल भी खड़े कर रही हैं। अंतिम संस्कार की कहीं दो विधियां तो नहीं थी। एक दफनाने की और दूसरी इस तरह की भट्टी में जलाने की, लेकिन इस पर विस्तृत शोध करने की जरूरत है। हड़प्पा काल में मनुष्य प्रकृति के बेहद निकट था। अनुमान यह भी है कि कहीं कब्रगाह स्थल के पास अग्नि की पूजा की जाती रही होगी।
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हर बार मिले हैं मनके, बनती थी माला
बड़ौत। हड़प्पा कालीन उत्खनन केंद्रों पर कब्र और कंकाल के पास हर जगह मनके मिले हैं। सिनौली में पहले और दूसरे चरण की खुदाई में भी बड़ी संख्या में मनके मिले थे। इन्हें माला में प्रयोग किया जाता था। अंतिम संस्कार में मृतक के पास ही इन्हें छोड़ दिया जाता रहा होगा।