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कांवड़ यात्रा में कांवड़िया और परिजनों को करना पड़ता है परहेज
Updated Mon, 06 Aug 2018 01:20 AM IST
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बड़ौत (बागपत)।
कांवड़ लेने गए भोले के भक्तों को यात्रा मार्ग में और उनके परिजनों को यात्रा पूर्ण होने तक घर पर बहुत से परहेज करना पड़ता है।
कांवड़ियों और उनके परिवार के सदस्यों के द्वारा तामसिक भोजन का परहेज किया जाता है। यात्रा पूर्ण होने तक घर पर दाल, सब्जी में छौंका नहीं लगता है। तवे पर रोटी को फूलने नहीं दिया जाता है, घर में सिलाई, कड़ाई का कार्य नहीं किया जाता। वहीं कांवड़ियों के लिए ध्रूमपान, शेविंग, शीश देखना, चमड़े की वस्तुएं, साबुन, तेल, कंघे के साथ कुर्सी, वाहन, चारपाई, पलंग पर बैठना निषेध माना जाता है। रोटी को चपाती, मिर्च को लंका, चप्पल को खड़ाऊ, नहाने को स्नान, लोटे को सागर, कपड़ों को वस्त्र, कुत्ते को भैरव, मूत्र को लघुशंका पुकारा जाता है। जहां कांवड़ रखी होती है, उस स्थान से ऊपर नहीं बैठ सकते नही। जमीन पर सोना होता है।
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कांवड़ लेने गए भोले के भक्तों को यात्रा मार्ग में और उनके परिजनों को यात्रा पूर्ण होने तक घर पर बहुत से परहेज करना पड़ता है।
कांवड़ियों और उनके परिवार के सदस्यों के द्वारा तामसिक भोजन का परहेज किया जाता है। यात्रा पूर्ण होने तक घर पर दाल, सब्जी में छौंका नहीं लगता है। तवे पर रोटी को फूलने नहीं दिया जाता है, घर में सिलाई, कड़ाई का कार्य नहीं किया जाता। वहीं कांवड़ियों के लिए ध्रूमपान, शेविंग, शीश देखना, चमड़े की वस्तुएं, साबुन, तेल, कंघे के साथ कुर्सी, वाहन, चारपाई, पलंग पर बैठना निषेध माना जाता है। रोटी को चपाती, मिर्च को लंका, चप्पल को खड़ाऊ, नहाने को स्नान, लोटे को सागर, कपड़ों को वस्त्र, कुत्ते को भैरव, मूत्र को लघुशंका पुकारा जाता है। जहां कांवड़ रखी होती है, उस स्थान से ऊपर नहीं बैठ सकते नही। जमीन पर सोना होता है।