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जिंदगी दांव पर लगाकर मिली थी उम्मीदों की आजादी
Updated Wed, 15 Aug 2018 01:21 AM IST
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बागपत। आजादी का 72वां जश्न। आजाद सुबह की पहली हवा के झोंके आज भी जिले के बुजुर्ग महसूस करते हैं। अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार और आजादी के लिए किया गया संघर्ष आज भी याद हैं। बुजुर्ग कहते हैं कि जिंदगी दांव पर लगाकर ही स्वतंत्रता हासिल की थी।
बागपत के कोर्ट रोड निवासी यूसुफ (80) बताते हैं कि तब उम्र आठ साल थे। परिवार किशनपुर बराल में रहता था। पिता स्कूल में टीचर थे। याद है कि पिता ने 15 अगस्त की सुबह कहा था कि देश आजाद हो गया है, स्कूल चलना है। लोग खुशी मना रहे हैं। यूसुफ चलो जश्न मनाते हैं। पिता ने कितने ही किस्से सुनाए थे आजादी के। अंग्रेज किस तरह किसान और मजदूरों पर अत्याचार करते थे। बहू और बेटी को परेशान किया करते थे। लोग घुड़सवार अंग्रेजों को देखकर सहम जाते थे। आजादी जरूरी मिली, लेकिन उम्मीद टूटी हुई नजर आती है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा का स्तर समय के साथ नहीं बढ़ा। जातिवाद और धर्म का बोलबाला आज भी है।
पाली गांव निवासी बेगराज सिंह (98) कहते हैं कि आजाद हवा में सांस लेने के लिए बुजुर्गों ने बलिदान दिया है। कई पीढ़ी ने संघर्ष किया। घुड़सवार अंग्रेजों को देखकर ग्रामीण रास्ते से हट जाते थे। किसान छिप जाते थे। जिस दिन आजादी मिली हर गली में जश्न मनाया गया। घरों में पकवान बनाए गए थे। खादी का झंडा लहराया गया। लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था। बेगराज सिंह कहते हैं कि साल 1946 में उनकी शादी हुई थी। अंग्रेजों के डर से बाराती लाठी लेकर गए थे।
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अंग्रेजों की मुश्किल थी सामाजिक एकता
बागपत। बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेज भारत की मजबूत सामाजिक व्यवस्था से दुखी थे। लोगों की एकता को वह कभी नहीं तोड़ पाए। देशवासियों ने अत्याचार सहे, लेकिन इसके बावजूद सब एक रहे। अंग्रेज लोगों को एक जगह देखते ही खीझ जाते थे। खादी की टोपी से वह बेहद चिढ़ते थे। अंग्रेज खेतों में काम करने वाले किसानों की खादी की टोपी भी सिर से उतार दिया करते थे।
बसौद और बिजरौल से उठी क्रांति की चिंगारी
बागपत। बागपत के प्रत्येक गांव से आजादी की लड़ाई छिड़ी थी। लेकिन क्रांति गांव बसौद और बिजरौल से क्रांति की ज्वाला उठी थी। बसौद में तो ग्रामीणों का मुकाबला करने के लिए अंग्रेजों ने तोप लगा दी थी। इस गांव की मिसाल आज भी दी जाती है। बिजरौल के बाबा शाहमल ने आजादी के लिए बलिदान दिया। पश्चिम यूपी के बलिदानियों में उनका नाम लिया जाता है।
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बागपत के कोर्ट रोड निवासी यूसुफ (80) बताते हैं कि तब उम्र आठ साल थे। परिवार किशनपुर बराल में रहता था। पिता स्कूल में टीचर थे। याद है कि पिता ने 15 अगस्त की सुबह कहा था कि देश आजाद हो गया है, स्कूल चलना है। लोग खुशी मना रहे हैं। यूसुफ चलो जश्न मनाते हैं। पिता ने कितने ही किस्से सुनाए थे आजादी के। अंग्रेज किस तरह किसान और मजदूरों पर अत्याचार करते थे। बहू और बेटी को परेशान किया करते थे। लोग घुड़सवार अंग्रेजों को देखकर सहम जाते थे। आजादी जरूरी मिली, लेकिन उम्मीद टूटी हुई नजर आती है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, शिक्षा का स्तर समय के साथ नहीं बढ़ा। जातिवाद और धर्म का बोलबाला आज भी है।
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पाली गांव निवासी बेगराज सिंह (98) कहते हैं कि आजाद हवा में सांस लेने के लिए बुजुर्गों ने बलिदान दिया है। कई पीढ़ी ने संघर्ष किया। घुड़सवार अंग्रेजों को देखकर ग्रामीण रास्ते से हट जाते थे। किसान छिप जाते थे। जिस दिन आजादी मिली हर गली में जश्न मनाया गया। घरों में पकवान बनाए गए थे। खादी का झंडा लहराया गया। लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था। बेगराज सिंह कहते हैं कि साल 1946 में उनकी शादी हुई थी। अंग्रेजों के डर से बाराती लाठी लेकर गए थे।
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अंग्रेजों की मुश्किल थी सामाजिक एकता
बागपत। बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेज भारत की मजबूत सामाजिक व्यवस्था से दुखी थे। लोगों की एकता को वह कभी नहीं तोड़ पाए। देशवासियों ने अत्याचार सहे, लेकिन इसके बावजूद सब एक रहे। अंग्रेज लोगों को एक जगह देखते ही खीझ जाते थे। खादी की टोपी से वह बेहद चिढ़ते थे। अंग्रेज खेतों में काम करने वाले किसानों की खादी की टोपी भी सिर से उतार दिया करते थे।
बसौद और बिजरौल से उठी क्रांति की चिंगारी
बागपत। बागपत के प्रत्येक गांव से आजादी की लड़ाई छिड़ी थी। लेकिन क्रांति गांव बसौद और बिजरौल से क्रांति की ज्वाला उठी थी। बसौद में तो ग्रामीणों का मुकाबला करने के लिए अंग्रेजों ने तोप लगा दी थी। इस गांव की मिसाल आज भी दी जाती है। बिजरौल के बाबा शाहमल ने आजादी के लिए बलिदान दिया। पश्चिम यूपी के बलिदानियों में उनका नाम लिया जाता है।
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