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छपरौली में बंपर बढ़त का इंतजार करता रह गया रालोद
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बागपत। छपरौली रालोद का 82 साल पुरा गढ़। लोकसभा चुनाव में छपरौली से बड़ी बढ़त की उम्मीद लगाए बैठे रालोद को जोर का झटका लगा। पिछले लोकसभा चुनाव के सापेक्ष यहां रालोद जीता जरूर, लेकिन बढ़ रही कुछ वोटों की। छपरौली विधानसभा में जाट मतों का बड़ी संख्या में भाजपा पर ध्रुवीकरण हुआ। विधानसभा चुनाव 2017 में भी यहां भाजपा मामूली अंतर से ही हार गई थी।
रालोद के रणनीतिकारों का आंकलन था कि छपरौली और सिवाल खास सीट पर उन्हें बड़ी बढ़त मिलेगी। किसी हद तक सिवाल खास सीट पर रालोद को बढ़त मिली भी, लेकिन छपरौली में सिर्फ 13142 वोटों से रालोद जीता। ऐसे में बागपत और बड़ौत विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी की बढ़त को काटना रालोद के लिए मुश्किल हो गया। छपरौली और रालोद का जुड़ाव करीब 82 साल पुराना है। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह ने कभी इसी विधानसभा सीट से साल 1937 में राजनीति की शुरूआत की थी। चुनाव की बात करें तो विधानसभा चुनाव में यहां पर रालोद अजेय है। लेकिन पिछले सात साल से वोटरों के मिजाज ने रालोद को मुश्किल में डाल रखा है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां से रालोद के प्रत्याशी जीते थे, लेकिन जीत का अंतर सिर्फ साढे तीन हजार ही रहा था। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इस विधानसभा में भी जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार रालोद ने वापसी की। लेकिन वापसी का अंतर मामूली रहा, जिस कारण रालोद प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा।
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रालोद के रणनीतिकारों का आंकलन था कि छपरौली और सिवाल खास सीट पर उन्हें बड़ी बढ़त मिलेगी। किसी हद तक सिवाल खास सीट पर रालोद को बढ़त मिली भी, लेकिन छपरौली में सिर्फ 13142 वोटों से रालोद जीता। ऐसे में बागपत और बड़ौत विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी की बढ़त को काटना रालोद के लिए मुश्किल हो गया। छपरौली और रालोद का जुड़ाव करीब 82 साल पुराना है। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह ने कभी इसी विधानसभा सीट से साल 1937 में राजनीति की शुरूआत की थी। चुनाव की बात करें तो विधानसभा चुनाव में यहां पर रालोद अजेय है। लेकिन पिछले सात साल से वोटरों के मिजाज ने रालोद को मुश्किल में डाल रखा है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां से रालोद के प्रत्याशी जीते थे, लेकिन जीत का अंतर सिर्फ साढे तीन हजार ही रहा था। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इस विधानसभा में भी जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार रालोद ने वापसी की। लेकिन वापसी का अंतर मामूली रहा, जिस कारण रालोद प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा।
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