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उतम तप धर्म अंगीकार कर विशेष पूजा अर्चना की
Updated Sun, 03 Sep 2017 01:24 AM IST
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बड़ौत (बागपत)।
जैन अनुयायियों के चल रहे दशलक्षण पर्व के आठवें दिन जैन अनुयायियों ने उत्तम तप धर्म धारण कर विशेष पूजा अर्चना की और मंदिरों में विधान में पूजा के कार्यक्रम आयोजित किए।
दिगंबर जैन समाज शहर के तत्वावधान में बड़ा जैन मंदिर में प्रभावना भूषण और अनुमान सागर महाराज के सानिध्य में दिगंबर जैन युवा मंच के तत्वावधान में चल रहे तेरहदीप महामंडल विधान में भगवान चंद्रप्रभु का अभिषेक किया । विधानाचार्य अमर चंद जैन शास्त्री के निर्देशन में नित्य नियम की पूजा दशलक्षण धर्म की पूजा तथा सोलहकरण की पूजा भक्ति भाव से की । वहीं विधान में सिद्ध क्षेत्र पर बने अक्रतिम चेत्यालय में विराजमान भगवान की पूजा की । विधान में आठ पूजा हुई। बीच-बीच में अमरचंद जैन शास्त्री ने विधान का महत्व बताया।
जैन छोटा मंदिर में श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर का विशेषकर पूजन किया। इसके बाद नित्य नियम की पूजा दशलक्षण धर्म व सोलहकरण की पूजा की । दिगंबर जैन अतिथि भवन में बच्चों, महिलाओं तथा पुरुषों ने विशेष पूजा-अर्चना की । सायंकाल दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में भगवान चंद्रप्रभु की आरती उतारी । छोटे जैन मंदिर और जैन अतिथि भवन में श्रद्धालुओं ने भगवान की पूजा की। इस मौके पर प्रवीण जैन, सतीश जैन, अतुल जैन, सुभाष जैन, सुरेंद्र जैन, दिनेश जैन, विपुल जैन, रविंद्र जैन, अंकुर जैन, रमेश जैन, प्रदीप जैन, सुनील जैन, नरेश चंद जैन का सहयोग रहा। रात्रि में दिगंबर जैन अतिथि भवन में जैन समाज के बच्चों ने दोषी कौन न्याय की अदालत नामक नाटिका का मंचन किया।
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इच्छा को जला देना है तपस्या - अनुमान सागर महराज
बड़ौत। जैन अतिथि भवन में आयोजित धर्मसभा में अनुमान सागर महाराज ने कहा पतन से उत्थान की ओर बढ़ने का नाम तपस्या है। कर्मों के क्षय करने के लिए साधना करना तपस्या है। मन की इच्छा को जला देना तपस्या है। जब आत्मा में संयम का जागरण होता है तभी व्यक्ति तपस्या को अंगीकार करता है। संसार की समस्त आत्मा परमात्मा तपस्या के माध्यम से ही हुई है। तपस्या के अभाव में शरीर और आत्मा पृथक नहीं होती। आत्मा की उपलब्धि भी नहीं होती।
आठवें दिन उत्तम तप धर्म अंगीकार किया
बड़ौत। अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर कमेटी के तत्वावधान में विहर्ष सभागार में आचार्य सुंदर सागर महाराज के सानिध्य में आयोजित संगीतमय पूजा में जैन श्रद्धालुओं ने उत्तम तप धर्म अंगीकार किया। दशलक्षण पर्व के आठवें दिन ब्रह्मारी रीता दीदी व नीरज के नेतृत्व में इंद्र-इंद्राणियों ने नित्य नियम की पूजा कीं। शांतिधारा का सौभाग्य विक्रम कुमार, अभिषेक जैन को प्राप्त हुआ। नित्य नियम की पूजा में नवदेवता पूजन, भगवान अजितनाथ पूजन, नंदीश्वर पूजन व दशलक्षण पूजा विधि-विधान से की। इसमें प्रमोद जैन, अशोक जैन, मदन लाल जैन, वरदान जैन, संदीप जैन, अखिलेश जैन आदि रहे।
त्याग करना बहुत कठिन - आचार्य सुंदर सागर
बड़ौत। आचार्य सुंदर सागर महाराज ने कहा त्याग जिन शासन का प्राण है। त्याग करना बहुत कठिन है और ज्यादा कठिन है उस त्याग को निभाना। त्याग भगवान महावीर के शासन की आधारशिला है। दिगंबरत्व का चिह्न है। संसार में रहना है तो भी त्याग करना होगा तथा मोक्ष मार्ग में रहना है तो भी त्याग करना है। हमें क्रोध, मान, माया, लोभ, कषाय तथा खोटे परिणामों का त्याग करना चाहिए। उन्होंने कहा आज के दिन धर्म के नाम पर कुछ लोग बहुत अधिक हिंसा कर रहे हैं। भारत जैसे देश में जहां जियो और जीने दो तथा अहिंसा परमो धर्म का नारा बोला जाता है, वहां लाखों पशुओं का धर्म के नाम पर बलिदान हो रहा है। सभा का संचालन वरदान जैन ने किया। शाम को विहर्ष सभागार में दशलक्षण पर्व की विशेष आरती हुई तथा उसके पश्चात गुरू भक्ति और प्रश्न मंच का आयोजन हुआ।
अपने को राग और द्वेष से दूर रखो - अरुण मुनि
बड़ौत। दशलक्षण पर्व के आठवें दिन जैन स्थानक नया बाजार में आयोजित धर्मसभा में जैन संत अरुण मुनि ने कहा जहां जितना अधिक राग होगा, वहां द्वेष उससे भी अधिक होगा, द्वेष से अपने आपको सदा दूर रखो। उन्होंने कहा जिस वस्तु के प्रति जितना राग होगा द्वेष उससे भी अधिक होगा। द्वेष का मतलब है घृणा, बैर, विरोध। मन यदि संयमित होगा तो संकलेश दूर होगा, राग को को प्रशस्त राग से जीतो। उन्होंने कहा जिंदगी प्यार का गीत है। इसे नफरत का अफसाना मत बनने दो। यदि हम द्वेष से दूर हटेंगे, तभी यह संभव होगा। सामायिक करना एक अभ्यास है। इसको प्रैक्टिकल व्यवहार में जाने से होता है। उन्होंने कहा हमारे कान भगवान की वाणी सुनकर नतमस्तक हो जाते हैं। मां शब्द सुनकर मन में ममता का भाव जागृत होगा और उग्रवाद का शब्द सुनकर मन में भय पैदा होता है। इससे पूर्व अमन मुनि ने भी धर्मसभा में विचार रखे। इसमें सुधीर जैन, विनोद जैन, टीटू, अजय, मोहित, दीपक, हंस कुमार, शैलबाला, प्रियंका, पिंकी वर्मा, निकेता, नीलू जैन आदि रहे।
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जैन अनुयायियों के चल रहे दशलक्षण पर्व के आठवें दिन जैन अनुयायियों ने उत्तम तप धर्म धारण कर विशेष पूजा अर्चना की और मंदिरों में विधान में पूजा के कार्यक्रम आयोजित किए।
दिगंबर जैन समाज शहर के तत्वावधान में बड़ा जैन मंदिर में प्रभावना भूषण और अनुमान सागर महाराज के सानिध्य में दिगंबर जैन युवा मंच के तत्वावधान में चल रहे तेरहदीप महामंडल विधान में भगवान चंद्रप्रभु का अभिषेक किया । विधानाचार्य अमर चंद जैन शास्त्री के निर्देशन में नित्य नियम की पूजा दशलक्षण धर्म की पूजा तथा सोलहकरण की पूजा भक्ति भाव से की । वहीं विधान में सिद्ध क्षेत्र पर बने अक्रतिम चेत्यालय में विराजमान भगवान की पूजा की । विधान में आठ पूजा हुई। बीच-बीच में अमरचंद जैन शास्त्री ने विधान का महत्व बताया।
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जैन छोटा मंदिर में श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर का विशेषकर पूजन किया। इसके बाद नित्य नियम की पूजा दशलक्षण धर्म व सोलहकरण की पूजा की । दिगंबर जैन अतिथि भवन में बच्चों, महिलाओं तथा पुरुषों ने विशेष पूजा-अर्चना की । सायंकाल दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में भगवान चंद्रप्रभु की आरती उतारी । छोटे जैन मंदिर और जैन अतिथि भवन में श्रद्धालुओं ने भगवान की पूजा की। इस मौके पर प्रवीण जैन, सतीश जैन, अतुल जैन, सुभाष जैन, सुरेंद्र जैन, दिनेश जैन, विपुल जैन, रविंद्र जैन, अंकुर जैन, रमेश जैन, प्रदीप जैन, सुनील जैन, नरेश चंद जैन का सहयोग रहा। रात्रि में दिगंबर जैन अतिथि भवन में जैन समाज के बच्चों ने दोषी कौन न्याय की अदालत नामक नाटिका का मंचन किया।
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इच्छा को जला देना है तपस्या - अनुमान सागर महराज
बड़ौत। जैन अतिथि भवन में आयोजित धर्मसभा में अनुमान सागर महाराज ने कहा पतन से उत्थान की ओर बढ़ने का नाम तपस्या है। कर्मों के क्षय करने के लिए साधना करना तपस्या है। मन की इच्छा को जला देना तपस्या है। जब आत्मा में संयम का जागरण होता है तभी व्यक्ति तपस्या को अंगीकार करता है। संसार की समस्त आत्मा परमात्मा तपस्या के माध्यम से ही हुई है। तपस्या के अभाव में शरीर और आत्मा पृथक नहीं होती। आत्मा की उपलब्धि भी नहीं होती।
आठवें दिन उत्तम तप धर्म अंगीकार किया
बड़ौत। अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर कमेटी के तत्वावधान में विहर्ष सभागार में आचार्य सुंदर सागर महाराज के सानिध्य में आयोजित संगीतमय पूजा में जैन श्रद्धालुओं ने उत्तम तप धर्म अंगीकार किया। दशलक्षण पर्व के आठवें दिन ब्रह्मारी रीता दीदी व नीरज के नेतृत्व में इंद्र-इंद्राणियों ने नित्य नियम की पूजा कीं। शांतिधारा का सौभाग्य विक्रम कुमार, अभिषेक जैन को प्राप्त हुआ। नित्य नियम की पूजा में नवदेवता पूजन, भगवान अजितनाथ पूजन, नंदीश्वर पूजन व दशलक्षण पूजा विधि-विधान से की। इसमें प्रमोद जैन, अशोक जैन, मदन लाल जैन, वरदान जैन, संदीप जैन, अखिलेश जैन आदि रहे।
त्याग करना बहुत कठिन - आचार्य सुंदर सागर
बड़ौत। आचार्य सुंदर सागर महाराज ने कहा त्याग जिन शासन का प्राण है। त्याग करना बहुत कठिन है और ज्यादा कठिन है उस त्याग को निभाना। त्याग भगवान महावीर के शासन की आधारशिला है। दिगंबरत्व का चिह्न है। संसार में रहना है तो भी त्याग करना होगा तथा मोक्ष मार्ग में रहना है तो भी त्याग करना है। हमें क्रोध, मान, माया, लोभ, कषाय तथा खोटे परिणामों का त्याग करना चाहिए। उन्होंने कहा आज के दिन धर्म के नाम पर कुछ लोग बहुत अधिक हिंसा कर रहे हैं। भारत जैसे देश में जहां जियो और जीने दो तथा अहिंसा परमो धर्म का नारा बोला जाता है, वहां लाखों पशुओं का धर्म के नाम पर बलिदान हो रहा है। सभा का संचालन वरदान जैन ने किया। शाम को विहर्ष सभागार में दशलक्षण पर्व की विशेष आरती हुई तथा उसके पश्चात गुरू भक्ति और प्रश्न मंच का आयोजन हुआ।
अपने को राग और द्वेष से दूर रखो - अरुण मुनि
बड़ौत। दशलक्षण पर्व के आठवें दिन जैन स्थानक नया बाजार में आयोजित धर्मसभा में जैन संत अरुण मुनि ने कहा जहां जितना अधिक राग होगा, वहां द्वेष उससे भी अधिक होगा, द्वेष से अपने आपको सदा दूर रखो। उन्होंने कहा जिस वस्तु के प्रति जितना राग होगा द्वेष उससे भी अधिक होगा। द्वेष का मतलब है घृणा, बैर, विरोध। मन यदि संयमित होगा तो संकलेश दूर होगा, राग को को प्रशस्त राग से जीतो। उन्होंने कहा जिंदगी प्यार का गीत है। इसे नफरत का अफसाना मत बनने दो। यदि हम द्वेष से दूर हटेंगे, तभी यह संभव होगा। सामायिक करना एक अभ्यास है। इसको प्रैक्टिकल व्यवहार में जाने से होता है। उन्होंने कहा हमारे कान भगवान की वाणी सुनकर नतमस्तक हो जाते हैं। मां शब्द सुनकर मन में ममता का भाव जागृत होगा और उग्रवाद का शब्द सुनकर मन में भय पैदा होता है। इससे पूर्व अमन मुनि ने भी धर्मसभा में विचार रखे। इसमें सुधीर जैन, विनोद जैन, टीटू, अजय, मोहित, दीपक, हंस कुमार, शैलबाला, प्रियंका, पिंकी वर्मा, निकेता, नीलू जैन आदि रहे।