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आखिर कैसे निकलेगा सलाखों के पीछे का दर्द
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Tue, 05 Apr 2016 12:01 AM IST
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जिला जेल
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जेल मैनुअल में भले ही विजिटर के जरिए बंदियों की समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाने और उसका निराकरण कराने की व्यवस्था है, लेकिन जिला मंडल/जिला कारागार में 2005 के बाद विजिटर समिति का गठन ही नहीं हुआ है। अब इसे विभाग और जिला प्रशासन की लापरवाही मानी जाए या फिर शिथिलता।
हालांकि जेल में हर वर्ष विजिट करने वालों के लिए रजिस्टर बनाया जाता है लेकिन विजिटर नामित नहीं किए जाते। यही कारण है कि जेल प्रशासन की मनबढ़ई और बंदियों की समस्या ऊपर नहीं पहुंच पाती। बंदी और अधिकारियों के बीच संवाद स्थापित करने वाला कोई नहीं है।
डीआईजी जेल गोरखपुर रेंज यादूवेंद्र शुक्ला की माने तो तीन सदस्यीय विजिटर टीम नामित की जाती है। टीम के सदस्य बीच-बीच में बंदियों से मिलते हैं और उनकी समस्याओं का निस्तारण करने के लिए अपनी राय देते है।
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तीन सदस्यीय विजिटर टीम के लिए जिलाधिकारी के निर्देश पर जेल प्रशासन तीन लोगों के नाम का चयन करता है। लेकिन मंडल कारागार में वर्ष 2005 से ही यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई। डीआईजी जेल गोरखपुर रेंज के अनुसार, आजमगढ़, गोरखपुर और बस्ती मंडल के किसी भी जेल में विजिटर की व्यवस्था नहीं है।
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हालांकि जेल में हर वर्ष विजिट करने वालों के लिए रजिस्टर बनाया जाता है लेकिन विजिटर नामित नहीं किए जाते। यही कारण है कि जेल प्रशासन की मनबढ़ई और बंदियों की समस्या ऊपर नहीं पहुंच पाती। बंदी और अधिकारियों के बीच संवाद स्थापित करने वाला कोई नहीं है।
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डीआईजी जेल गोरखपुर रेंज यादूवेंद्र शुक्ला की माने तो तीन सदस्यीय विजिटर टीम नामित की जाती है। टीम के सदस्य बीच-बीच में बंदियों से मिलते हैं और उनकी समस्याओं का निस्तारण करने के लिए अपनी राय देते है।
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तीन सदस्यीय विजिटर टीम के लिए जिलाधिकारी के निर्देश पर जेल प्रशासन तीन लोगों के नाम का चयन करता है। लेकिन मंडल कारागार में वर्ष 2005 से ही यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई। डीआईजी जेल गोरखपुर रेंज के अनुसार, आजमगढ़, गोरखपुर और बस्ती मंडल के किसी भी जेल में विजिटर की व्यवस्था नहीं है।