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महुला-गढ़वल बांध पर रैनकट से खतरा
अमर उजाला ब्यूरो, आजमगढ़
Updated Thu, 15 Jun 2017 11:13 PM IST
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महुला-गढ़वल बांध पर रैनकट से खतरा
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सगड़ी तहसील क्षेत्र के उत्तरी सीमा से होकर गुजरने वाली घाघरा की बाढ़ से निपटने के लिए विभाग की ओर से तैयारियों का पूरा करने का दावा किया जा रहा है लेकिन अभी तक महुला-गढ़वल बांध में बने रैनकट को भरने की कोई कवायद नहीं की गई है। जिसके कारण बाढ़ के समय बंधे की कटान का खतरा बना हुआ है।
महुला से गढ़वल की दूरी लगभग 43 किलोमीटर है। जिसमें लगभग 52 रेगुलेटर हैं। सभी रेगुलेटरों की विभाग द्वारा ग्रीसिंग कर दी गई है। बताते चलें कि महुला गढ़वल बांध और घाघरा नदी के बीच करीब सवा लाख की आबादी निवास करती है। लोगों के निवास करने का यह क्षेत्रफल लगभग 75000 हेक्टेयर में फैला है। वैकल्पिक व्यवस्था न होने और अपने पैतृक आवास के मोह के कारण लोग नदी और बंधे के बीच जीवन-यापन करने को विवश हैं। गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी घाघरा नदी बाढ़ आने पर उत्पात मचाना शुरू कर देगी और देवाराखास राजा गांव का मुराली का पुरवा और चक्की का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
समय रहते कटान रोकने के लिए अभी तक किसी भी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। विगत वर्ष कटान को रोकने के लिए विभाग द्वारा पांच करोड़ रुपये खर्च किए थे। इस बार रेगुलेटरों की ग्रीसिंग कर विभाग अपनी तैयारियों को पूरा होना बता रहा है। जबकि बंधे के अस्तित्व को खतरा बने रैनकट को भरने की कोई कवायद अभी शुरू भी नहीं हो सकी है। वहीं जो गांव कटान के मुहाने पर हैं उन्हें बचाने की भी कोई कोशिश नजर नहीं आ रही है।
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महुला से गढ़वल की दूरी लगभग 43 किलोमीटर है। जिसमें लगभग 52 रेगुलेटर हैं। सभी रेगुलेटरों की विभाग द्वारा ग्रीसिंग कर दी गई है। बताते चलें कि महुला गढ़वल बांध और घाघरा नदी के बीच करीब सवा लाख की आबादी निवास करती है। लोगों के निवास करने का यह क्षेत्रफल लगभग 75000 हेक्टेयर में फैला है। वैकल्पिक व्यवस्था न होने और अपने पैतृक आवास के मोह के कारण लोग नदी और बंधे के बीच जीवन-यापन करने को विवश हैं। गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी घाघरा नदी बाढ़ आने पर उत्पात मचाना शुरू कर देगी और देवाराखास राजा गांव का मुराली का पुरवा और चक्की का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
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समय रहते कटान रोकने के लिए अभी तक किसी भी प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। विगत वर्ष कटान को रोकने के लिए विभाग द्वारा पांच करोड़ रुपये खर्च किए थे। इस बार रेगुलेटरों की ग्रीसिंग कर विभाग अपनी तैयारियों को पूरा होना बता रहा है। जबकि बंधे के अस्तित्व को खतरा बने रैनकट को भरने की कोई कवायद अभी शुरू भी नहीं हो सकी है। वहीं जो गांव कटान के मुहाने पर हैं उन्हें बचाने की भी कोई कोशिश नजर नहीं आ रही है।
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