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कैफी के लिखे गीतों को आज भी गुनगुनाते हैं लोग
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मेजवां। प्रगतिशील शायरों में शुमार कैफी आजमी के गीत हर किसी के जुबान पर हैं। वह शायरी में इंकलाब के हिमायती थे और फिल्मी गीतों में भी उन्होंने विचारधारा को तरजीह दी।
आजादी के बाद जिन लेखकों और शायरों ने सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन खड़ा किया कैफी आजमी उनमें से एक हैं। उन्होंने शायरी के जरिए दुनिया में न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि इंकलाब की वकालत भी करते रहे। इनके बचपन का नाम सैयद अतहर हुसैन रिजवी था। उनकी मां का नाम हफीजुन बीवी और पिता का नाम फतेह हुसैन था। आज भी मेजवां गांव में उनके पिता के नाम से निर्मित फतेह मंजिल मौजूद है। फूलपुर तहसील के मेजवां गांव में 14 जनवरी 1919 में जन्मे कैफी आजमी का पुश्तैनी मकान खंडहर में तब्दील हो चुका है। 1933 में 14 वर्ष की उम्र में कैफी आजमी ने पहली गजल लिखी थी। प्रगतिशील शायर होने के नाते उनके दिल में हमेशा गांव के विकास के लिए एक कसक हुआ करती थी। वे व्हील चेयर पर बैठकर भी गांव के भलाई के काम करते रहे। उनके पिता फतेह हुसैन भी एक शायर थे जो घरों में ही शेर शायरी करते थे।
अखबार बिछा फुटपाथ पर सोए
मेजवां। कैफी आजमी 1933 के बाद मुंबई चले गए। यहां उन्होंने काफी संघर्ष किया यहां तक कि उन्हें फुटपाथ पर रात में अखबार ि लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए अडिग रहे। वह काफी दिनों तक मुंबई में थे। 1980-81 के दशक में जब वे दूसरी बार मेजवां आए तो यहीं के होकर रह गए। आठ फरवरी 1972 को कैफी को मुंबई में फालिज का असर हुआ तो उन्हे अपना पैतृक गांव मेजवां काफी याद आने लगी। इलाज के बाद जब उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ तो वे चल पड़े अपने पैतृक गांव की ओर।
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कई फिल्मों में लिखे गीत, जो आज भी हैं मशहूर
मेजवां। वर्ष 1948 में शहीद लतीफ की ‘‘बुजदिल’’ उनकी पहली फ़िल्म थी। इसके बाद शमां, कागज के फूल, हकीकत, पाकीजा, शोला और शबनम, अर्थ, अनुपमा, हंसते जख्म, मंथन, हीर रांझा, शगुन, हिंदुस्तान की कसम, नौनिहाल, नसीब, तमन्ना, फिर तेरी कहानी याद आयी, सहित कई फिल्मों में उन्होंने गीत लिखे। लेकिन उन्होंने फिल्मों को अपना कैरियर नहीं बनाया।
कैफी साहब जमींदार घराने के होने के बावजूद गरीबों के दुख दर्द को महसूस करते थे। उन्हें गांव की तरक्की की हमेशा फिक्र सताती रही। 1981-82 के दशक में उन्हें प्राइमरी स्कूल खोलने के लिए मैंने ही भूमि का आवंटन किया था। आज कैफी साहब की वजह से सिलाई, चिकनकारी सेंटर, गर्ल्स इंटर कालेज, कंप्यूटर सेंटर, डाकघर गांव में स्थापित है। कैफी आजमी रेल संघर्षों से जुड़े रहे। वे प्रतिभा के धनी थे।
एखलाक अहमद, कैफी साहब के बचपन के साथी।
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आजादी के बाद जिन लेखकों और शायरों ने सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन खड़ा किया कैफी आजमी उनमें से एक हैं। उन्होंने शायरी के जरिए दुनिया में न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि इंकलाब की वकालत भी करते रहे। इनके बचपन का नाम सैयद अतहर हुसैन रिजवी था। उनकी मां का नाम हफीजुन बीवी और पिता का नाम फतेह हुसैन था। आज भी मेजवां गांव में उनके पिता के नाम से निर्मित फतेह मंजिल मौजूद है। फूलपुर तहसील के मेजवां गांव में 14 जनवरी 1919 में जन्मे कैफी आजमी का पुश्तैनी मकान खंडहर में तब्दील हो चुका है। 1933 में 14 वर्ष की उम्र में कैफी आजमी ने पहली गजल लिखी थी। प्रगतिशील शायर होने के नाते उनके दिल में हमेशा गांव के विकास के लिए एक कसक हुआ करती थी। वे व्हील चेयर पर बैठकर भी गांव के भलाई के काम करते रहे। उनके पिता फतेह हुसैन भी एक शायर थे जो घरों में ही शेर शायरी करते थे।
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अखबार बिछा फुटपाथ पर सोए
मेजवां। कैफी आजमी 1933 के बाद मुंबई चले गए। यहां उन्होंने काफी संघर्ष किया यहां तक कि उन्हें फुटपाथ पर रात में अखबार ि लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए अडिग रहे। वह काफी दिनों तक मुंबई में थे। 1980-81 के दशक में जब वे दूसरी बार मेजवां आए तो यहीं के होकर रह गए। आठ फरवरी 1972 को कैफी को मुंबई में फालिज का असर हुआ तो उन्हे अपना पैतृक गांव मेजवां काफी याद आने लगी। इलाज के बाद जब उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ तो वे चल पड़े अपने पैतृक गांव की ओर।
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कई फिल्मों में लिखे गीत, जो आज भी हैं मशहूर
मेजवां। वर्ष 1948 में शहीद लतीफ की ‘‘बुजदिल’’ उनकी पहली फ़िल्म थी। इसके बाद शमां, कागज के फूल, हकीकत, पाकीजा, शोला और शबनम, अर्थ, अनुपमा, हंसते जख्म, मंथन, हीर रांझा, शगुन, हिंदुस्तान की कसम, नौनिहाल, नसीब, तमन्ना, फिर तेरी कहानी याद आयी, सहित कई फिल्मों में उन्होंने गीत लिखे। लेकिन उन्होंने फिल्मों को अपना कैरियर नहीं बनाया।
कैफी साहब जमींदार घराने के होने के बावजूद गरीबों के दुख दर्द को महसूस करते थे। उन्हें गांव की तरक्की की हमेशा फिक्र सताती रही। 1981-82 के दशक में उन्हें प्राइमरी स्कूल खोलने के लिए मैंने ही भूमि का आवंटन किया था। आज कैफी साहब की वजह से सिलाई, चिकनकारी सेंटर, गर्ल्स इंटर कालेज, कंप्यूटर सेंटर, डाकघर गांव में स्थापित है। कैफी आजमी रेल संघर्षों से जुड़े रहे। वे प्रतिभा के धनी थे।
एखलाक अहमद, कैफी साहब के बचपन के साथी।