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सेशन जज ने दिया डॉक्टर और अधिवक्ता पर मुकदमा दर्ज करने का आदेश

Mon, 14 Feb 2022 11:29 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 14 Feb 2022 11:29 PM IST
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Order to file case against doctor and advocate
वादी और उसके परिवार को फंसाने के उद्देश्य से फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनवाने के मामले में सेशन जज ने डॉक्टर और अधिवक्ता के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया है।
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लालगंज तहसील बार के पूर्व अध्यक्ष लालजी सिंह एडवोकेट की बेटी की शादी 2009 में हुई थी। उनका पड़ोसी जितेंद्र सिंह शादी में बाधा डालने की नीयत से अपने परिवार के सदस्यों समेत अन्य लोगों के साथ उनके घर पर चढ़कर बवाल करने लगा। इस दौरान जितेंद्र और उनके बुजुर्ग चाचा का पैर टूट गया। घटना के बाद लालजी सिंह ने थाने पर फोन किया। पुलिस दोनों पक्षों को थाने पर लाई और दोनों तरफ से एफआईआर किया। मामले में जितेंद्र सिंह घटना को अंजाम देने से पहले ही थाना तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लालगंज के अधिकारियों से मिलकर फर्जी मेडिकल बनवाया जिसमें जितेंद्र के पेट में गोली दिखाई गई थी। इस संबंध में अधिवक्ता लालजी सिंह की तरफ से धारा 156 (3 ) के तहत न्यायालय में एक वाद दाखिल किया गया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने मुकदमे को परिवाद में बदल दिया जिसकी निगरानी लालजी सिंह की ओर से विशेष न्यायालय में की गई। इसी बीच अधिवक्ता के निधन के बाद उनका पुत्र कुंवर लव प्रताप सिंह पैरवी कर रहा था। 8 फरवरी 2022 को न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश विशेष न्यायाधीश ईसी एक्ट जयेंद्र कुमार पांडेय की अदालत में फौजदारी निगरानी संख्या 285 / 2018 दाखिल था। निगरानीकर्ता के तरफ से अधिवक्ता अशोक कुमार सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता लाल बहादुर सिंह ने पक्ष रखा। बहस सुनने के बाद अदालत ने दस्तावेज और जिला मेडिकल रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद यह पाया कि केवल वादी व उसके परिवार को धारा 307 भारतीय दंड संहिता में फंसाने के नीयत से गोली लगने का फर्जी मेडिकल बनवाया गया। मेडिकल रिपोर्ट का परीक्षण व गोली का फायर न होना और जिला अस्पताल की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि केवल फंसाने की नीयत से पड़ोसी जितेंद्र सिंह व डॉ. ऋषिकेश गुप्ता ने फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनाई। न्यायालय ने अभियुक्त सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लालगंज पर तैनात तत्कालीन डाक्टर ऋषिकेश गुप्ता और जितेंद्र सिंह एडवोकेट निवासी खुमा देवरी पर आपराधिक मुकदमा दर्ज कर विवेचना करने का निर्देश दिया। साथ ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के एक जून 2018 के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने मेडिकल रिपोर्ट का बिना अवलोकन किए उक्त बाद को परिवाद में दर्ज कर दिया।
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