पूर्वांचल में एक और नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान की मौत, लगातार 8वीं बार हुए थे निर्वाचित
कोरोना काल में हुए उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के बाद से अब तक कई नवनिर्वाचित ग्राम प्रधानों की मौत की खबर सामने आई है। ताजा मामला पूर्वांचल के आजमगढ़ जिले में लगातार 8वीं बार प्रधान पद निर्वाचित हुए सुखराम यादव की रविवार को मौत हो गई।
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कोराना संक्रमण के नए मामलों में आंशिक कमी जरूर दर्ज हुई है। लेकिन कोविड से मरने वालों का सिलसिला नहीं थम रहा है। आजमगढ़ जिले के ठेकमा विकास खंड के बड़गहन गांव निवासी नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान (85) वर्षीय सुखराम यादव की मौत हो गई। उनका उपचार वाराणसी के अस्पताल में चल रहा था। उनके निधन खबर जैसे ही हुई पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई।
मृतक सुखराम यादव को मतगणना के दूसरे ही दिन से ही हल्का बुखार और सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। परिजन इलाज के लिए उन्हें जौनपुर ले गए। डॉक्टरों ने उन्हें वाराणसी रेफर कर दिया। डॉक्टरों ने रविवार को इलाज के दौरान मृत घोषित कर दिया। जानकारी होने पर क्षेत्रीय लोगों ने पहुंचकर शोक संवेदना व्यक्त किया।
मृतक सुखराम यादव बड़गहन ग्राम सभा से 8वीं बार प्रधान पद निर्वाचित हुए थे। वह काफी व्यवहार कुशल व्यक्ति थे। गांव का समर्थन मिलने पर 34 मतों से जीत दर्ज की थी। उनकी पत्नी की दो वर्ष पहले मौत हो गई थी। उनके दो लड़की और चार लड़के हैं। परिजनों का रो-रो के बुरा हाल है।
बता दें कि पंचायत चुनाव के बाद से अब तक कई नवनिर्वाचित ग्राम प्रधानों की मौत की खबर सामने आई है। बीते सोमवार को ही मऊ जिल के मुहम्मदाबाद गोहना ब्लॉक के फरीदपुर धर्मा गांव के नवनिर्वाचित ग्राम प्रधान का कोरोना से निधन हो गया था।
कोरोना ने पकड़ी गांव की राह
पंचायत चुनाव के बाद कोरोना ने गांव की राह पकड़ ली है। प्रशासन की ओर से गांवों में संक्रमण को रोकने के लिए हर प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन अभी भी लोग जांच कराने से कतरा रहे हैं।
बुखार और खांसी आने पर लोग उसे वायरल और काली खांसी का नाम देकर झोला छाप चिकित्सकों से उपचार तो करा रहे हैं जिसके चलते समस्या बढ़ रही है।
ज्यादातर लोग कोरोना जांच कराने से परहेज कर रहे हैं। जनपद में पंचायत चुनाव के दौरान काफी संख्या में लोग मुंबई, दिल्ली जैसे महानगरों से घर आए हैं। इनके द्वारा पंचायत चुनाव में अपने प्रत्याशी के समर्थन में जहां प्रचार-प्रसार किया वहीं मतदान और मतगणना के दिन अभिकर्ता भी बना गए।
जिसका परिणाम है कि कोरोना ने अब शहर को छोड़कर गांवों का रूख किया है। शायद ही गांव का कोई एस घर हो जिसमें सर्दी, खांसी, जुकाम और बुखार के मरीज न हों। लेकिन लोग जांच कराने की बजाए इसे वायरल मानकर झोला छाप चिकित्सकों से इलाज करा रहे हैं।