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राष्ट्रीय दुग्ध दिवस आज: तीन करोड़ की डेयरी छह साल में ठप
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आजमगढ़। सपा शासन काल में विकास की कई परियोजनाएं जनपद में स्थापित हुईं। इन्हीं परियोजनाओं में एक थी लेदौरा की डेयरी। 10 हजार लीटर की क्षमता वाली इस डेयरी को कभी भी पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं मिला। जो मिल रहा है उससे से भी दुग्ध उत्पाद यहां तैयार नहीं हो रहे हैं। गोरखपुर से दुग्ध उत्पादों को मंगाकर जनपद में आपूर्ति की जा रही है। वर्तमान में यह डेयरी सिर्फ दुग्ध उत्पादों को ठंडा करने के काम में आ रही है। वर्ष 2014 में लेदौरा में उच्च क्षमता के डेयरी प्लांट की स्थापना लगभग तीन करोड़ की लागत से शुरू हुई थी। 2016 में इसका लोकार्पण कर इसे जनता को समर्पित किया गया। शुरू में तो यह डेयरी ठीकठाक ढ़ंग से संचालित होती रही लेकिन कभी भी इसे पर्याप्त दूध नहीं मिल सका। इसका मुख्य कारण बाजार में दूध के दाम और डेयरी समिति द्वारा दिए जाने वाले दूध के दाम में काफी अंतर था। इस कारण समितियों की स्थापना तो हुई लेकिन वह किसानों को लुभाने में नाकाम रहीं। पशुपालकों को समय से उनके पैसे का भुुगतान भी नहीं किया गया। वर्तमान में भी दो महीने से किसानों के दूध का पैसा डेयरी पर बकाया है। छह माह से डेयरी से दुग्ध उत्पादों का उत्पादन बंद है। गोरखपुर से दुग्ध उत्पाद मंगा कर आपूर्ति की जाती है। वर्तमान में जनपद में कुल 30 समितियां संचालित हो रही हैं, जिनके जरिए डेयरी को मात्र 500 लीटर दूध ही उपलब्ध हो रहा है। जिसे डेयरी में ठंडा कर गोरखपुर भेजा जाता है। उप दुग्धशाला विकास अधिकारी सुधाकर प्रसाद ने बताया कि क्वायल जलने के कारण छह माह से डेयरी बंद है। यहां सिर्फ दुग्ध उत्पादों को ठंडा करने का कार्य किया जाता है। डेयरी अपने संचालन का खर्च भी नहीं निकाल पा रही है। वर्तमान में भी दो महीने से किसानों के दूध का पैसा डेयरी पर बकाया है।
डेयरी में नहीं बनते स्टैंडर्ड मानक के दुग्ध उत्पाद
आजमगढ़। डेयरी में काफी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती है। बावजूद छह माह से जले क्वायल को भी बदला नहीं जा सका है। अधिकारियों का कहना है कि डेयरी में स्टैंडर्ड मानक के दुग्ध उत्पाद तैयार नहीं होते हैं। इस कारण हम दूध को ठंडा कर गोरखपुर भेजते हैं और वहां से दुग्ध उत्पाद मंगाकर जनपद में वितरित करते हैं।
जनपद में है 1200 से 1500 लीटर दूध की खपत
आजमगढ़। जनपद में 1200 से 1500 लीटर दूध की खपत है। 10 हजार लीटर की डेयरी जनपद में स्थापित होने के बाद भी यह लोगों की जरूरत को पूरा करने में नाकाम साबित हो रही है। आज जनपद में अन्य कंपनियों की दूध की खपत ज्यादा है।
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पांच बार गोकुल पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं लालचंद वर्मा
बूढ़नपुर। विकासखंड कोयलसा के बहेलियापार गांव निवासी पशुपालक लालचंद वर्मा को पांच पर उप्र सरकार की ओर से गोकुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उनके पुत्र शंकर वर्मा को तीन बार और भोला वर्मा को तीन बार गोकुल पुरस्कार मिल चुका है। दुग्ध उत्पादन में लालचंद वर्मा का बड़ा योगदान है। उनके यहां प्रतिदिन 350 लीटर से लेकर 400 लीटर तक दूध का उत्पादन और कलेक्शन किया जाता है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में दूध उत्पादन करना तो आसान है लेकिन उसे बेच पाना बड़ा कठिन है। जिस तरह से पशुओं का चारा-दाना महंगा हो रहा है ऐसी स्थिति में पशुपालन करना घाटे का सौदा हो गया है। शादी-विवाह के समय में तो दूध की मांग ज्यादा होती है। जब शादी-विवाह समाप्त हो जाता है तो दूध को ओने-पौने दाम में बेचना पड़ता है।
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डेयरी में नहीं बनते स्टैंडर्ड मानक के दुग्ध उत्पाद
आजमगढ़। डेयरी में काफी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती है। बावजूद छह माह से जले क्वायल को भी बदला नहीं जा सका है। अधिकारियों का कहना है कि डेयरी में स्टैंडर्ड मानक के दुग्ध उत्पाद तैयार नहीं होते हैं। इस कारण हम दूध को ठंडा कर गोरखपुर भेजते हैं और वहां से दुग्ध उत्पाद मंगाकर जनपद में वितरित करते हैं।
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जनपद में है 1200 से 1500 लीटर दूध की खपत
आजमगढ़। जनपद में 1200 से 1500 लीटर दूध की खपत है। 10 हजार लीटर की डेयरी जनपद में स्थापित होने के बाद भी यह लोगों की जरूरत को पूरा करने में नाकाम साबित हो रही है। आज जनपद में अन्य कंपनियों की दूध की खपत ज्यादा है।
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पांच बार गोकुल पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं लालचंद वर्मा
बूढ़नपुर। विकासखंड कोयलसा के बहेलियापार गांव निवासी पशुपालक लालचंद वर्मा को पांच पर उप्र सरकार की ओर से गोकुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उनके पुत्र शंकर वर्मा को तीन बार और भोला वर्मा को तीन बार गोकुल पुरस्कार मिल चुका है। दुग्ध उत्पादन में लालचंद वर्मा का बड़ा योगदान है। उनके यहां प्रतिदिन 350 लीटर से लेकर 400 लीटर तक दूध का उत्पादन और कलेक्शन किया जाता है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में दूध उत्पादन करना तो आसान है लेकिन उसे बेच पाना बड़ा कठिन है। जिस तरह से पशुओं का चारा-दाना महंगा हो रहा है ऐसी स्थिति में पशुपालन करना घाटे का सौदा हो गया है। शादी-विवाह के समय में तो दूध की मांग ज्यादा होती है। जब शादी-विवाह समाप्त हो जाता है तो दूध को ओने-पौने दाम में बेचना पड़ता है।