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राष्ट्रीय हैंडलूम दिवस: समय की मार से अछूता नहीं रहा मुबारकपुर का हैंडलूम उद्योग, अब खत्म हो रही इसकी रौनक

Wed, 07 Aug 2024 05:26 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़।
अमर उजाला नेटवर्क, आजमगढ़। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Wed, 07 Aug 2024 05:26 PM IST
सार

Azamarh News: मशीनी युग में अब बुनकरी की कला खत्म होती जा रही है। संकरी गलियों में होने वाली खटर-पटर अब शांत होती जा रही है। इसके साथ ही बढ़ती जा रही हैं बुनकरों की तकलीफें। इस महंगाई में अब उन्हें दो पैसा बचाना भी मुश्किल हो गया है।

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National Handloom Day Mubarakpur industry not remained untouched by ravages of time
मुबारकपुर में बुनकरी करता युवक। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आजमगढ़ के पूर्वी छोर पर स्थित मुबारकपुर कस्बा कभी मिनी दुबई के नाम से जाना जाता था। हजारों लोग यहां पर रोजगार की तलाश में आते थे। समय की मार इस उद्योग पर भी पड़ी और धीरे-धीरे कर हैंडलूम बंद होते गए। उनकी जगह पावरलूम ने ले लिया।

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कच्चे माल के दामों में बढ़ोत्तरी और शासन की उदासीनता की मार इस उद्योग पर पड़ी। एक-एक कर पावरलूम भी बंद होते गए और बुनकर खाड़ी देशों को पलायन करने लगे। वर्तमान में ओडीओपी के तहत रेशमी साड़ी का चयन भी हुआ, लेकिन अभी तक कारोबार पटरी पर नहीं लौट सका है।
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सौ वर्ष पूर्व कस्बे के बुनकर समाज ने सबसे पहले हथकरघा पर कपड़ा बुनाई का कार्य शुरू किया और मोटे सूत से कपड़ा बुनना शुरू किया। धीरे धीरे कर बुनकरों ने कपड़ा बुनाई में रेशम का उपयोग करना शुरू किया। जिससे बुनकरों को कुछ अधिक पैसे मज़दूरी के तौर पर मिलने लगे और बुनकरों की आर्थिक स्थिति में दिन प्रतिदिन सुधार होने लगा। जिससे हैंडलूम के उद्योग को पंख लगना शुरू हो गया।
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यह उद्योग लगातार विकसित होता गया। प्रतिदिन दर्जनों बाहरी व्यापारी कस्बे में आते और अपनी डिमांड के अनुसार साड़ियां खरीदते थे। बुनकर अपने तैयार साड़ियों को उन व्यापारियों को बेचते थे। जिससे उन बुनकरों की जीविका सुचारु रूप से चलती थी, जिससे आम तौर बुनकर मजदूरों की आर्थिक स्थिति और बेहतर होती गई। आम बुनकर को प्रतिदिन एक हथकरघा से पांच सौ से लेकर छह सौ रुपये तक मजदूरी मिलती थी जिससे बुनकर काफी खुशहाल रहता था।

शिया-सुन्नी दंगे से छिनी कारोबार की रंगत
लगभग 25 वर्ष पूर्व नवंबर 1999 को कस्बे में शिया सुन्नी दंगा भड़क गया, जिसके चलते क्षेत्र के लोगों में भय की स्थिति उत्पन्न हो गई। एक बार पुनः जनवरी सन 2000 में शाम के समय मार्केट के दौरान सीरियल बम ब्लास्ट हो गया, जिसमें दर्जन भर लोगों की हत्या हुई। इस घटना से बाहरी व्यापारियों का आवागमन बंद हो गया। व्यापारियों का कस्बे में आना बंद हुआ कि कारोबार बुरी तरह से बैठ गया। जो आज तक उबर नहीं सका है।

रॉ मटेरियल के बढ़े दामों ने तोड़ी कमर
दंगे के बाद कारोबार तो शुरू हुआ लेकिन साड़ियों को तैयार करने में उपयोगी रॉ मटेरियल रेशम, ज़री आदि के भाव में उछाल के चलते आम बुनकर परेशान हो गया। इससे वह क्षेत्र के बड़े व्यवसाइयों से रॉ मटेरियल लेकर औने पौने दाम पर उन्हीं व्यवसाइयों को बेंचकर अपने परिवार की जीविका चलाने पर विवश हो गया। धीरे धीरे कर हथकरघा उद्द्योग क्षेत्र के पूंजीपतियों के हाथों में सिमटता चला गया। विपणन केंद्र बना, लेकिन वह भी बेमतलब साबित हो रहा है।

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