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बंदर बड़े शैतान, जनता बेचारी परेशान
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आजमगढ़। शहर के कई मुहल्लों में शैतान बंदरों से लोग परेशान हैं। शहर के कलेक्टर चौराहा, रैदोपुर, सिधारी, हर्रा की चुंगी, हरिबंशपुर, रेलवे स्टेशन, बेलाइसा, सब्जी मंडी समेत आदि इलाकों में बंदरों ने नाक में दम कर रखा है।
बंदर घरों में तो उत्पात कर ही रहे हैं। दफ्तरों के बाहर खड़े वाहनों की सीट फाड़ देते हैं। छतों पर कुछ सुरक्षित नहीं रह पा रहा है। बंदर या तो उठा ले जाते हैं उसे तहस-नहस कर देते हैं। बंदरों के भय से कुछ लोग तो छत को भी जाली से घेरवा दिया है। बंदर लोगों पर भी हमला कर देते हैं। सात साल पहले बंदरों को पकड़ने की मुहिम चलाई गई थी। तब 2,500 बंदर पकड़े गए थे। उनको कुसमी के जंगल में छोड़ने की बात थी लेकिन धनछुला और सुम्ही बाजार के पास ही बंदरों को छोड़ दिया गया। बाद में बंदर शहर में लौट आए। वन विभाग का कहना है कि बंदरों को पकड़ने का उसके पास कोई बजट नहीं है और यह काम नगर पालिका का है।
बंदरों को पकड़ने के लिए अलग से बजट मिलता है। हमारे स्तर से बंदरों को नहीं पकड़ा जा सकता। उन्हें पकड़ने के लिए अलग टीम होती है। इसके लिए जिला प्रशासन ही कुछ कर सकता है। एक बंदर को पकड़ने में काफी खर्चा आता है।
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गंगादत्त मिश्रा, डीएफओ आजमगढ़
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बंदर घरों में तो उत्पात कर ही रहे हैं। दफ्तरों के बाहर खड़े वाहनों की सीट फाड़ देते हैं। छतों पर कुछ सुरक्षित नहीं रह पा रहा है। बंदर या तो उठा ले जाते हैं उसे तहस-नहस कर देते हैं। बंदरों के भय से कुछ लोग तो छत को भी जाली से घेरवा दिया है। बंदर लोगों पर भी हमला कर देते हैं। सात साल पहले बंदरों को पकड़ने की मुहिम चलाई गई थी। तब 2,500 बंदर पकड़े गए थे। उनको कुसमी के जंगल में छोड़ने की बात थी लेकिन धनछुला और सुम्ही बाजार के पास ही बंदरों को छोड़ दिया गया। बाद में बंदर शहर में लौट आए। वन विभाग का कहना है कि बंदरों को पकड़ने का उसके पास कोई बजट नहीं है और यह काम नगर पालिका का है।
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बंदरों को पकड़ने के लिए अलग से बजट मिलता है। हमारे स्तर से बंदरों को नहीं पकड़ा जा सकता। उन्हें पकड़ने के लिए अलग टीम होती है। इसके लिए जिला प्रशासन ही कुछ कर सकता है। एक बंदर को पकड़ने में काफी खर्चा आता है।
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गंगादत्त मिश्रा, डीएफओ आजमगढ़