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मेेजवां के लिए धड़कता था कैफी का दिल
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Sat, 09 May 2015 12:06 AM IST
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‘वो मेरा गांव वो मेरे गांव के चूल्हे कि जिनमें शोले तो शोले धुआं नहीं मिलता’ यह पंक्ति मशहूर शायर कैफी आजमी के हैं। जिनके दिल में गरीबी और पिछड़ेपन की कसक थी। कैफी आजमी ने जब मेजवां में काम शुरू किया तो वहां कुछ भी नहीं था। लोग प्रेशर कुकर और टेलीविजन के बारे में भी नहीं जानते थे। लेकिन आज कैफी की बदौलत मेजवां एक माडल गांव के रूप में जाना जाता है।
फूलपुर तहसील के दक्षिण मेजवां गांव के एक जमींदार परिवार में 14 जनवरी सन् 1919 में कैफी आजमी का जन्म हुआ अैार 10 मई 2002 को मुंबई के यशलोक अस्पताल में निधन। उनका नाम सय्यद अतहर हुसैन रिजवी था। बाद में वे कैफी आजमी के नाम से मशहूर हुए। उन्होंने 11 वर्ष की उम्र में पहली गजल ‘इतना तो जिंदगी में किसी के खलल पडे़, हंसने से हो न सुकूं रोने से कल पडे़’ लिखी। उनकी रचना शीलता अंतिम सांस तक सक्रिय रही। उन्होंने 1943 में मुंबई में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उर्दू समाचार पत्र कौमी जंग में कुछ दिन काम किया। इसके बाद उन्होंने प्रख्यात नाट्य कर्मी शौकत से निकाह कर लिया।
फरवरी 1972 में उनको फालिज का असर हुआ, इसके बाद वे अपने गांव मेजवां आ गए।1982-83 के दशक में फूलपुर मुख्यमार्ग से मेजवां तक पिच मार्ग का निर्माण हुआ। फिल्मों में उन्होंने गीत लेखन अपने जीवन यापन के लिए किया था। 1948 में शहीद लतीफ की ‘बुजदिल’ उनकी पहली फिल्म थी। ‘शमा’, ‘कागज के फूल’, ‘हकीकत’, ‘पाकीजा’, ‘शोला और शबनम’, ‘अर्थ’, ‘अनुपमा’, ‘हंसते जख्म’, ‘मंथन’, ‘हीर रांझा’, ‘शगुन’, ‘हिंदुस्तान की कसम’, ‘नौनिहाल’, ‘नसीब’, ‘फिर तेरी कहानी याद आई’, ‘तमन्ना’ सहित कई फिल्मों में उन्होंने गीत लिखा। जिले में कैफी साहब की स्मृतियों को याद करते हुए पूर्व प्रधान एखलाक अहमद और उनके खानदान के शौकत हुसैन कहते है कि वह जमींदार घराने के होने के बावजूद गरीबों के दर्द को शिद्दत से महसूस करते थे। जो बाद में उनकी शायरी का हिस्सा बन गया।
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फूलपुर तहसील के दक्षिण मेजवां गांव के एक जमींदार परिवार में 14 जनवरी सन् 1919 में कैफी आजमी का जन्म हुआ अैार 10 मई 2002 को मुंबई के यशलोक अस्पताल में निधन। उनका नाम सय्यद अतहर हुसैन रिजवी था। बाद में वे कैफी आजमी के नाम से मशहूर हुए। उन्होंने 11 वर्ष की उम्र में पहली गजल ‘इतना तो जिंदगी में किसी के खलल पडे़, हंसने से हो न सुकूं रोने से कल पडे़’ लिखी। उनकी रचना शीलता अंतिम सांस तक सक्रिय रही। उन्होंने 1943 में मुंबई में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उर्दू समाचार पत्र कौमी जंग में कुछ दिन काम किया। इसके बाद उन्होंने प्रख्यात नाट्य कर्मी शौकत से निकाह कर लिया।
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फरवरी 1972 में उनको फालिज का असर हुआ, इसके बाद वे अपने गांव मेजवां आ गए।1982-83 के दशक में फूलपुर मुख्यमार्ग से मेजवां तक पिच मार्ग का निर्माण हुआ। फिल्मों में उन्होंने गीत लेखन अपने जीवन यापन के लिए किया था। 1948 में शहीद लतीफ की ‘बुजदिल’ उनकी पहली फिल्म थी। ‘शमा’, ‘कागज के फूल’, ‘हकीकत’, ‘पाकीजा’, ‘शोला और शबनम’, ‘अर्थ’, ‘अनुपमा’, ‘हंसते जख्म’, ‘मंथन’, ‘हीर रांझा’, ‘शगुन’, ‘हिंदुस्तान की कसम’, ‘नौनिहाल’, ‘नसीब’, ‘फिर तेरी कहानी याद आई’, ‘तमन्ना’ सहित कई फिल्मों में उन्होंने गीत लिखा। जिले में कैफी साहब की स्मृतियों को याद करते हुए पूर्व प्रधान एखलाक अहमद और उनके खानदान के शौकत हुसैन कहते है कि वह जमींदार घराने के होने के बावजूद गरीबों के दर्द को शिद्दत से महसूस करते थे। जो बाद में उनकी शायरी का हिस्सा बन गया।
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