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नक्कारे की गूंज पर दिखे मुहब्बत के कई रंग

Thu, 17 Mar 2016 11:52 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़ Updated Thu, 17 Mar 2016 11:52 PM IST
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Many appeared to echo the color of love Nkkare
लोक महोत्सव
दूसरे दिन गुरुवार को कार्यक्रम का शुभारंभ अपराह्न दो बजे से परिचर्चा के साथ हुआ। इसमें प्रख्यात फिल्म लेखक रंजीत कपूर, आगरा की ‘भगत’ विधा के निर्देशक अनिल शुक्ल, कहानियों को नौटंकी विधा में रूपांतरित कर नौटंकी को नया आयाम देने वाले राजकुमार श्रीवास्तव आदि ने भाग लिया।
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इस दौरान सभी ने विलुप्त होती नौटंकी के स्वरूप में क्या बदलाव की जरूरत है, पर परिचर्चा की। अपराह्न कानपुर प्रशिक्षण केंद्र के हरिश्चंद्र वाल्मीकि कश्यप ने अपने 15 साथियों के संग नक्कारे के साथ अन्य साजों को बजाकर समां बांध दिया। शाम को शंकरगढ़ संग्राम के कथानक को मथुरा से आए वरिष्ठ रंगकर्मी किशन स्वरूप पचौरी के निर्देशन में उनके साथियों ने प्रस्तुत किया। इसका पैगाम था कि सारे बिगड़े काम मुहब्बत से ही बनते है।
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इसके बाद, राजस्थान के बाड़मेर के विशाला गांव के मंगनियार घराने से आए फकीरा खान और साथियों ने सुप्रसिद्ध राजस्थानी सूफी गायन पेश किया। इसमें स्वागत गीत ‘केसरिया बालम, पधारो म्हारे देश’ को लोगों ने खूब पसंद किया। नौटंकी शंकरगढ़ संग्राम और फूलसिंह को सभी ने सराहा। इन प्रस्तुतियों और इनके संवादों में लोक गायन ठुमरी, थिएटर, कवित्त, छंद, दौड़, दो बोला विधाओं का समावेश था।
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