मोहन से सीखें सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी का निर्वहन
रानी की सराय थाना क्षेत्र के साकीपुर गांव निवासी मोहन राजभर पुत्र छोटेलाल राजभर मुंबई में रहकर ट्रांसपोर्ट कंपनी में टेलर चलाने का काम करते थे। लॉक डाउन घोषित होने के बाद जिस ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते थे उसने उनके न तो तीन महीने की मजदूरी दी और ना ही राशन ही दिया। जब तकलीफ होने लगी तो वह पैदल ही मुंबई से घर के लिए निकल पड़े।
रास्ते के झंझावतों से जूझते हुए मोहन दो मई को अपने गांव पहुंचे। वहां से वह सीधे मेडिकल कालेज गए जहां अपनी जांच कराई। जांच में सबकुछ ठीक होने के बाद भी गांव के लोगों के कहने पर मोहन ने स्वयं ही क्वारंटीन में रहने का निर्णय लिया और गांव के बाहर सीवान में स्थित अपने खेत में चारपाई और मच्छरदानी आदि लगाकर डेरा जमा लिया। तबसे मोहन यहीं पर जमे हुए हैं। मोहन ने बताया कि गांव का कोई भी व्यक्ति उनके पास नहीं आता है।
सिर्फ मां और पिताजी आते हैं लेकिन दूर से ही हमसे बात करते हैं। पत्तल में उनके द्वारा भोजन दिया जाता है और प्लास्टिक की गिलास में पानी। जिसे खाने के बाद वह फेंक देते हैं। उन्होंने कहा कि अगर मेरी वजह से मेरे गांव या मेरे परिवार को कोई बिमारी होती है तो यह ठीक नहीं है। इसलिए लोगों की सलाह पर मैंने खुद गांव से बाहर रहने का निर्णय लिया।