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कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले उस इंकलाब का.....

Mon, 13 Jan 2020 11:30 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 13 Jan 2020 11:30 PM IST
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koi t sood chukaye, koi tk jimma le  us inklaab ka
कैफी अजमी।- फाइल फोटो - फोटो : AZAMGARH
मेजवां। कोई तो सूद चुकाए कोई तो जिम्मा ले उस इंकलाब का जो आज तक उधार सा है..., ये पंक्तियां किसी और कि नहीं उर्दू के मशहूर शायर और गीतकार मरहूम कैफी आजमी की है। आज उनकी जयंती है और मेजवां में सादगी के साथ लोग उन्हें याद करेंगे।
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कैफी साहब ने अपनी रचनाओं में ताउम्र इंकलाब की वकालत की। उनकी मां का नाम हफीजुन बीबी और पिता फतेह हुसैन थे। आज भी मेजवां गांव में उनके पिता के नाम फतेह मंजिल मौजूद है। 14 जनवरी 1919 में जन्मे कैफी साहब का पूरा जीवन तो मुंबई में गुजरा लेकिन 1980-81 के दशक में जब वे दूसरी बार मेजवां आए तो यहीं के होकर रह गए। 8 फरवरी 1972 को कैफी को मुंबई में फालिज का असर हुआ तो उन्हें अपना पैतृक गांव मेजवां काफी याद आने लगा। इलाज के बाद जब उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ तो वे मेजवां आ गए। उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में पहली गजल लिखी थी। 1943 में मशहूर नाट्य कर्मी शौकत से निकाह किया। शौकत ने कैफी का हर मोड़ पर साथ दिया। जब भी कैफी साहब गांव आते उनके साथ उनकी खिदमत के लिए शौकत जरूर साथ होतीं। लंबी बीमारी के बाद शौकत का भी 22 नवंबर 2019 में निधन हो गया। वर्ष 1948 में शहीद लतीफ की बुजदिल कैफी आजमी की पहली फिल्म थी। शमा, कागज के फूल, हकीकत, पाकीजा, शोला और शबनम, अर्थ, अनुपमा, हस्ते जख्म, मंथन, हीर रांझा, शगुन, हिंदुस्तान की कसम, नौनिहाल, नसीब, तमन्ना, फिर तेरी कहानी याद आई जैसी कई फिल्मों में उन्होंने गीत लिखे। उन्होंने फिल्मों को अपना कैरियर नहीं बनाया क्योंकि उन्हें अमीरी गरीबी की दीवार को गिराना था। उन्होंने पूरा जीवन समाज सुधार में लगा दिया। उन्होंने केवल कविता के माध्यम से नहीं बल्कि अपनी जिंदगी से भी इंसानियत की सीख दी। गांव में रहकर उन्होंने विकास के कई कार्य किए जो लोगों के रोजगार का जरिया बना। कैफी साहब की बदौलत उनके पैतृक गांव मेजवां में वह हर एक सुख सुविधा है जो एक आदर्श गांव में होता है। जिले में कैफी साहब की स्मृतियों को याद करते हुए ग्राम बक्शपुर निवासी पूर्व प्रधान एखलाक अहमद कहते है कि कैफी साहब जमीदार घराने के होने के बावजूद गरीबों के दुख दर्द को महसूस करते थे। जो बाद में उनकी शायरी का हिस्सा बन गई।
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