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दो लाख के लिए बेटियों के हक को प्रशासन ने किया दरकिनार
Updated Fri, 14 Jul 2017 12:07 AM IST
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आजमगढ़। महिला सशक्तिकरण के तमाम बड़े-बड़े दावे करने वाले शासन -प्रशासन मुआवजे की मात्र दो लाख के लिए कानून का उल्लंघन करते नजर आए। शादी के बाद भी बेटियों की पिता की संपत्ति पर हक होने का आदेश कोर्ट की ओर से होने के बाद इसे कानून का रूप दिया गया है। इसके बाद भी जहरीली शराब के शिकार दो लोगों की बेटियों को इसलिए मुआवजे का हकदार नहीं माना गया, क्योंकि उनकी शादी हो चुकी थी।
जहरीली शराब से 25 लोगों की मौत को पुष्ट मानकर प्रशासन की ओर से उनकी सूची तैयार की गई थी। गुरुवार को प्रदेश सरकार के वनमंत्री दारा सिंह चौहान जीयनपुर के अजमतगढ़ और रौनापार के केवटहिया में 21 लोगों को शासन की ओर से दो-दो लाख रुपये के मुआवजे का चेक सौंपा। सूची में शामिल चार लोगों को इसलिए मुआवजा नहीं दिया गया, क्योंकि इसमें दो लोग सत्यदेव पुत्र कविलाश और श्यामवचन पुत्र चंद्रबली को कोई संतान नहीं थी। ये बात तो समझ में आती है, लेकिन अजमतगढ़ निवासी बद्री पुत्र पलटू और रामनयन गोड़ पुत्र परदेशी के परिवार को इसलिए मुआवजे के योग्य नहीं समझा गया क्योंकि उन्हें सिर्फ बेटियां थीं। बद्री की दो बेटियों बेचनी और किस्मती, इसी तरह रामनयन गोड़ की भी दे बेटियों वंदना और संगीता की शादी हो चुकी है। ऐसे में इन्हें मुआवजे का योग्य नहीं माना गया।
केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2005 में हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन कर शादी के बाद भी बेटी का पिता की संपत्ति पर हक पाने के लिए कानून बनाया गया था। इसके अलावा समय-समय पर न्यायालय भी इस संबंध में आदेश दे चुके हैं। जब बेटी का पिता की संपत्ति पर शादी के बाद अधिकार हो सकता है तो सरकार की ओर से बंटने वाले मुआवजे पर क्यों नहीं। हालांकि प्रशासन का तर्क है कि ये पैतृक संपत्ति का मामला नहीं है, लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि बद्री के जिंदा रहते वो अपनी बेटियों के लिए कुछ नहीं करता। तो मरने के बाद उसके परिवार के लिए आई रकम उन्हें क्यों नहीं मिली। प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ने मुआवजे का चेक बांटा गया, लेकिन उनकी ओर से भी मामले में कोई संज्ञान नहीं लिया गया।
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वर्ष 2005 में हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन कर कानून बनाया गया था। इसके अनुसार शादी के बाद भी बेटी पिता की संपत्ति पर दावा कर सकती है और उसकी हकदार है। बेटियों को पिता नाम पर आए मुआवजे से वंचित करना गलत है।
प्रण विजय सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता हाईकोर्ट
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शासन की ओर से मुआवजे के रूप में सहायता दी जाती है। ये पैतृक संपत्ति का मामला नहीं है। इसलिए बद्री और रामनयन का कोई वारिस नहीं होने के कारण उन्हें सहायता नहीं दी गई।
चंद्रभूषण सिंह, जिलाधिकारी
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जहरीली शराब से 25 लोगों की मौत को पुष्ट मानकर प्रशासन की ओर से उनकी सूची तैयार की गई थी। गुरुवार को प्रदेश सरकार के वनमंत्री दारा सिंह चौहान जीयनपुर के अजमतगढ़ और रौनापार के केवटहिया में 21 लोगों को शासन की ओर से दो-दो लाख रुपये के मुआवजे का चेक सौंपा। सूची में शामिल चार लोगों को इसलिए मुआवजा नहीं दिया गया, क्योंकि इसमें दो लोग सत्यदेव पुत्र कविलाश और श्यामवचन पुत्र चंद्रबली को कोई संतान नहीं थी। ये बात तो समझ में आती है, लेकिन अजमतगढ़ निवासी बद्री पुत्र पलटू और रामनयन गोड़ पुत्र परदेशी के परिवार को इसलिए मुआवजे के योग्य नहीं समझा गया क्योंकि उन्हें सिर्फ बेटियां थीं। बद्री की दो बेटियों बेचनी और किस्मती, इसी तरह रामनयन गोड़ की भी दे बेटियों वंदना और संगीता की शादी हो चुकी है। ऐसे में इन्हें मुआवजे का योग्य नहीं माना गया।
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केंद्र सरकार की ओर से वर्ष 2005 में हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन कर शादी के बाद भी बेटी का पिता की संपत्ति पर हक पाने के लिए कानून बनाया गया था। इसके अलावा समय-समय पर न्यायालय भी इस संबंध में आदेश दे चुके हैं। जब बेटी का पिता की संपत्ति पर शादी के बाद अधिकार हो सकता है तो सरकार की ओर से बंटने वाले मुआवजे पर क्यों नहीं। हालांकि प्रशासन का तर्क है कि ये पैतृक संपत्ति का मामला नहीं है, लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि बद्री के जिंदा रहते वो अपनी बेटियों के लिए कुछ नहीं करता। तो मरने के बाद उसके परिवार के लिए आई रकम उन्हें क्यों नहीं मिली। प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ने मुआवजे का चेक बांटा गया, लेकिन उनकी ओर से भी मामले में कोई संज्ञान नहीं लिया गया।
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वर्ष 2005 में हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन कर कानून बनाया गया था। इसके अनुसार शादी के बाद भी बेटी पिता की संपत्ति पर दावा कर सकती है और उसकी हकदार है। बेटियों को पिता नाम पर आए मुआवजे से वंचित करना गलत है।
प्रण विजय सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता हाईकोर्ट
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शासन की ओर से मुआवजे के रूप में सहायता दी जाती है। ये पैतृक संपत्ति का मामला नहीं है। इसलिए बद्री और रामनयन का कोई वारिस नहीं होने के कारण उन्हें सहायता नहीं दी गई।
चंद्रभूषण सिंह, जिलाधिकारी