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‘टोपी शुक्ला’ से आरंगम का आगाज
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Sun, 21 Dec 2014 12:15 AM IST
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नाट्य संस्था सूत्रधार के तत्वावधान में आयोजित 10वें आरंगम की शुरुआत हुई।
पहले दिन समानांतर इलाहाबाद द्वारा राही मासूम रजा कृत एवं अनिल रंजन भौमिक निर्देशित नाटक ‘टोपी शुक्ला’ की प्रस्तुति हुई।
इस प्रस्तुति के ठीक बाद निर्माण कला मंच पटना द्वारा उषा किरण खान कृत एवं संजय उपाध्याय द्वारा निर्देशित नाटक ‘हीरा डोम’ का मंचन किया गया।
आरंगम का शुभारंभ सपा जिलाध्यक्ष हवलदार यादव और संस्था के अध्यक्ष डा. सीके त्यागी ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर किया।
वहीं नाट्य प्रस्तुतियों के क्रम में ‘टोपी शुक्ला’ नाटक का मंचन किया गया। नाटक टोपी शुक्ला में यह दर्शाने की कोशिश की गई कि जो समाज में वैमनुष्यता है उसे दूर करने की आवश्यकता है।
वास्तव में व्यंग शैली में लिखी गई यह कृति जाति पर चोट करती है। धर्म में गहरे धंसे कुव्यवस्था पर चोट करती है। प्रधान शैली में लिखा गया यह उपन्यास आज के हिंदू-मुस्लिम संबंधों को पूरी सच्चाई के साथ पेश करते हुए बुद्धिजीवियों के सामने एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
बाद में दूसरा नाटक उषा किरण कृत नाटक ‘हीरा डोम’ का मंचन हुआ। जिसमें ठकैता 1977-78 ई. में पुलिस के हाथों क्रूरता से मारा गया था। इकलौता कलाकार था।
वह हीरा डोम की बबीता ‘अछूत की शिकायत’ का सस्वर पाठ करता था। यही सूत्र पकड़ कर ‘हीरा डोम’ नाटक का ताना-बाना बुना गया।
अपनी जातीय स्मिता को कैसे सुरक्षित रखा जाए, इसी अंतद्वंदों से होता हुआ पन्ना के प्रेमपाश में पड़ता है। हीरा को बेहद प्यार करने वाली पन्ना उसके डोम जाति के होने के कारण अंतत: उसे छोड़ देती है।
यही हीरा के जीवन का चरण बिंदु है। देखते-देखते हीरा संत हो गया और ठकैता डोम के मारे जाने के बाद रौनक जो पेशे से एक खोजी पत्रकार है, नाटक का नायक बनकर ठकैता एवं हीरा की परंपरा को आगे बढ़ाता है।
पहले दिन समानांतर इलाहाबाद द्वारा राही मासूम रजा कृत एवं अनिल रंजन भौमिक निर्देशित नाटक ‘टोपी शुक्ला’ की प्रस्तुति हुई।
इस प्रस्तुति के ठीक बाद निर्माण कला मंच पटना द्वारा उषा किरण खान कृत एवं संजय उपाध्याय द्वारा निर्देशित नाटक ‘हीरा डोम’ का मंचन किया गया।
आरंगम का शुभारंभ सपा जिलाध्यक्ष हवलदार यादव और संस्था के अध्यक्ष डा. सीके त्यागी ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर किया।
वहीं नाट्य प्रस्तुतियों के क्रम में ‘टोपी शुक्ला’ नाटक का मंचन किया गया। नाटक टोपी शुक्ला में यह दर्शाने की कोशिश की गई कि जो समाज में वैमनुष्यता है उसे दूर करने की आवश्यकता है।
वास्तव में व्यंग शैली में लिखी गई यह कृति जाति पर चोट करती है। धर्म में गहरे धंसे कुव्यवस्था पर चोट करती है। प्रधान शैली में लिखा गया यह उपन्यास आज के हिंदू-मुस्लिम संबंधों को पूरी सच्चाई के साथ पेश करते हुए बुद्धिजीवियों के सामने एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है।
बाद में दूसरा नाटक उषा किरण कृत नाटक ‘हीरा डोम’ का मंचन हुआ। जिसमें ठकैता 1977-78 ई. में पुलिस के हाथों क्रूरता से मारा गया था। इकलौता कलाकार था।
वह हीरा डोम की बबीता ‘अछूत की शिकायत’ का सस्वर पाठ करता था। यही सूत्र पकड़ कर ‘हीरा डोम’ नाटक का ताना-बाना बुना गया।
अपनी जातीय स्मिता को कैसे सुरक्षित रखा जाए, इसी अंतद्वंदों से होता हुआ पन्ना के प्रेमपाश में पड़ता है। हीरा को बेहद प्यार करने वाली पन्ना उसके डोम जाति के होने के कारण अंतत: उसे छोड़ देती है।
यही हीरा के जीवन का चरण बिंदु है। देखते-देखते हीरा संत हो गया और ठकैता डोम के मारे जाने के बाद रौनक जो पेशे से एक खोजी पत्रकार है, नाटक का नायक बनकर ठकैता एवं हीरा की परंपरा को आगे बढ़ाता है।