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नाटककार पंडित लक्ष्मी नारायण मिश्र की जयंती आज
Updated Wed, 20 Dec 2017 11:41 PM IST
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आजमगढ़। पंडित लक्ष्मी नारायण मिश्र का जन्म जनपद के बस्ती नामक गांव में हुआ था। शुरू से ही लेखन के क्षेत्र में उनकी काफी रूचि थी। सिंदूर की होली सहित कई नाटकों से अपनी पहचान बनाने वाले पंडित लक्ष्मी नारायण मिश्र देश के चुनिंदा नाटककारों में होती है। गुरुवार को उनकी जयंती पर नगर पालिका तिराहे पर स्थित उनकी प्रतिमा के कार्यक्रम पर साहित्य प्रेमियों का जमावड़ा होगा। जिसमें लोग उन्हें श्रद्घासुमन अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालेंगे।
मिश्र जी के एकांकी विषय वस्तु की दृष्टि से पौराणिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठ भूमि लिए हुए हैं। उनके एकांकियों में पात्र कम संख्या में रहते हैं। वे उनका चित्रांकन इस प्रकार करते हैं कि वे लेखक के मानसपुत्र न लग कर जीते-जागते और अपने निजी जीवन को जीते हुए लगते हैं। मिश्र जी की संवादयोजना सार्थक, आकर्षक, सरल, संक्षिप्त, मर्मस्पर्शी और नाटकीय गुणों से परिपूर्ण होती है। जिसमें तार्किकता और वाग्विदग्धता तो देखते ही बनती है।
वह एकांकी सहज हैं और रंग-मंचीय परंपराओं की कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनकी सफलता इस बात में है कि वे अपने उद्देश्य की पूर्ति उपदेशक बन कर नहीं अपितु कलाकार के रूप में करते हैं। अन्य लेखकों का कहना है कि मिश्र जी का मूल स्रोत यही अतीत भारतीय नाट्यशास्त्र है। उनका यथातथ्यवाद, मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि और यथार्थवाद संस्कृत नादकों से ही मिले हैं। वे अंतरंग में सदैव भारतीय हैं। उन्होंने भारतीय जीवन दर्शन के अनुरूप परिस्थितियों और कर्म व्यापारों का गठन किया है। प्राचीनता से भारतीय संस्कार लेकर नवीनता की चेतना उनमें प्रकट हुई है। उन्होंने 1926 में अशोक, 1930 में संयासी, 1931 में रक्षा का मंदिर, 1932 में मुक्ति का रहस्य, 1933 में राजयोग और सिंदूर की होली, 1936 में आधी रात, 1945 में गरुड़ध्वज आदि को लिखा है।
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मिश्र जी के एकांकी विषय वस्तु की दृष्टि से पौराणिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक पृष्ठ भूमि लिए हुए हैं। उनके एकांकियों में पात्र कम संख्या में रहते हैं। वे उनका चित्रांकन इस प्रकार करते हैं कि वे लेखक के मानसपुत्र न लग कर जीते-जागते और अपने निजी जीवन को जीते हुए लगते हैं। मिश्र जी की संवादयोजना सार्थक, आकर्षक, सरल, संक्षिप्त, मर्मस्पर्शी और नाटकीय गुणों से परिपूर्ण होती है। जिसमें तार्किकता और वाग्विदग्धता तो देखते ही बनती है।
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वह एकांकी सहज हैं और रंग-मंचीय परंपराओं की कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनकी सफलता इस बात में है कि वे अपने उद्देश्य की पूर्ति उपदेशक बन कर नहीं अपितु कलाकार के रूप में करते हैं। अन्य लेखकों का कहना है कि मिश्र जी का मूल स्रोत यही अतीत भारतीय नाट्यशास्त्र है। उनका यथातथ्यवाद, मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि और यथार्थवाद संस्कृत नादकों से ही मिले हैं। वे अंतरंग में सदैव भारतीय हैं। उन्होंने भारतीय जीवन दर्शन के अनुरूप परिस्थितियों और कर्म व्यापारों का गठन किया है। प्राचीनता से भारतीय संस्कार लेकर नवीनता की चेतना उनमें प्रकट हुई है। उन्होंने 1926 में अशोक, 1930 में संयासी, 1931 में रक्षा का मंदिर, 1932 में मुक्ति का रहस्य, 1933 में राजयोग और सिंदूर की होली, 1936 में आधी रात, 1945 में गरुड़ध्वज आदि को लिखा है।
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