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महिलाओं के कंधे पर परिवार नियोजन की कमान
Updated Sat, 16 Dec 2017 11:41 PM IST
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आजमगढ़। घर हो या बाहर वैसे तो पुरुष हर स्थान पर महिलाओं के सामने अपनी श्रेष्ठता साबित करते नजर आते हैं, लेकिन बात परिवार नियोजन की आती है तो उनकी श्रेष्ठता फुस्स होकर रह जाती है। जिले में परिवार नियोजन के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी सारी कवायदों की कमान महिलाओं ने ही संभाल रखी है। नसबंदी के जितने भी आपरेशन हुए हैं उसमें महिलाओं की हिस्सेदारी 98 फीसदी से अधिक है। पु रुष एक से दो फीसदी तक ही सिमट कर रह गए हैं। नसंबदी के लिए जो पुरुष स्वास्थ्य विभाग की दहलीज तक पहुंचते हैं या तो बहुत गरीब होते हैं या विकलांग। पिछले पांच सालों के दौरान मात्र 36 पुरुषों ने नसबंदी कराई है। वहीं, महिलाओं की नसबंदी भी लक्ष्य से काफी पीछे रह गई है। वहीं, इसके लिए स्वाथ्य विभाग परिवार नियोजन के अन्य उपायों का हवाला दे रहा है।
बढ़ती आबादी को रोकने के लिए परिवार नियोजन को लेकर जहां प्रत्येक वर्ष जोर-शोर से आवाज उठाई जाती है, वहीं,
में पुरुषों की भूमिका न के बराबर है। अब भी परिवार नियोजन की जवाबदेही सिर्फ महिलाओं के कंधे पर है। महिला सशक्तीकरण पर बातें हो तो हर स्थान पर कहा जाता है कि महिलाएं पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, लेकिन यहां तो यहां महिलाएं पुरुषों से इतनी आगे हैं कि पुरुषों को उनकी बराबरी कर पाना संभव ही नहीं दिख रहा है।
स्वास्थ्य विभाग के पिछले पांच साल के रिकॉर्ड से कई चंौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 2013-14 में जिले में 6229 महिलाओं सापेत्र एक पुरुष ने नसबंदी कराई वहीं, 2014-15 6570 महिलाओं के सापेक्ष भी इनकी संख्या एक ही रही। 2015-16 में 5981 महिलाओं ने तो नसबंदी कराई, लेकिन कोई पुरुष घर से ही नहीं निकला। 2016-17 में 5837 महिलाओं के सापेक्ष इनकी संख्या 27 रही। वहीं, जारी वित्तीय वर्ष में अभी 1390 महिलाओं के सापेक्ष अभी तक सात पुरुषों ने ही सबंदी कराई है। सरकार इस मद में लाखों रुपये खर्च कर रही है। इसके बावजूद पुरुष इसमें ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे हैं। यही कारण है कि नसबंदी की सबसे बेहतर कमीशन वाली योजना पूरी तरह से फ्लॉप हो रही है। नसबंदी कराने वाले पुरुषों को जहां तीन हजार रुपये देना होता है वहीं, महिलाओं को सिर्फ दो हाजर रुपये ही मिलते हैं। यही नहीं पुरुष को जागरूक कर उसका सरकारी अस्पताल में नसबंदी करवाने वाले को पांच सौ और महिलाओं को नसबंदी के लिए जागरूक करने वालों को तीन सौ रुपये मिलते हैं।
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लक्ष्य से काफी पीछे है विभाग
आजमगढ़। स्वास्थ्य विभाग को पहले 24085 नसबंदी सलाना करने का लक्ष्य होता था। सीएमओ डॉ. एसके तिवारी ने बताया कि 10 साल पहले इस लक्ष्य को समाप्त कर इसके अधिक से अधिक नसबंदी करने के निर्देश दिए गए। फिर भी स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों को देखे तो ये संतुष्टी योग्य नहीं है। हालांकि इस बारे में स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि परिवार नियोजन के लिए परिवारों की ओर से अब कापर टी, कंडोम और अन्य प्रकार के उपायों को अपनाया जा रहा है। इससे नसबंदी के ग्राफ पर असर पड़ रहा है।
घट रहे नसबंदी का ग्राफ
आजमगढ़। नसबंदी के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों को देख तो इसमें लगातार गिरावट हो रही है। 2014-15 में जहां 6570 महिलाओं ने नसबंदी कराई थी, वहीं 2015-16 में घट कर ये 5970 हो गया। 2016-17 में ये और घटकर 5837 तक पहुंच गया। चालू वित्तीय वर्ष में ये आंकड़ा अभी 1390 तक ही पहुंच पाया है।
ज्यदा प्रोत्साहन राशि, फिर भी नहीं बढ़ा उत्साह
आजमगढ़। तमाम संसाधन उपलब्ध होेने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग पुरुषों में नसबंदी को लेकर उत्साह नहीं बढ़ा पा रहा है। जो पुरुष नसबंदी के लिए पहुंचते भी हैं वो प्रोत्साहन राशि के लालच में आते हैं। इसमें ज्यादातर गरीब और मजदूर तबके के होते हैं। कई बार तो विकलांगों को पकड़कर स्वास्थ्य विभाग अपना आंकड़ा बढ़ाने की कोशिश करता है।
नसबंदी के बोलते आंकड़े
वर्ष पुरुष महिला
2017-18 07 1390
2016-17 27 5837
2015-16 0 5981
2014-15 01 6570
2013-14 01 6229
नसबंदी के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार किया जाता है। परिवार नियोजन के अन्य उपाय भी लोगों को पसंद आने लगे हैं। इससे नसबंदी के ग्राफ में कमी आई है। पुरुषों में भ्रातियों को लेकर उत्साह नहीं आ पा रहा है, जबकि इससे शारीरिक क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है। नसबंदी किसी भी मौसम में कराई जा सकती है।
डॉ.एसके तिवारी सीएमओ
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बढ़ती आबादी को रोकने के लिए परिवार नियोजन को लेकर जहां प्रत्येक वर्ष जोर-शोर से आवाज उठाई जाती है, वहीं,
में पुरुषों की भूमिका न के बराबर है। अब भी परिवार नियोजन की जवाबदेही सिर्फ महिलाओं के कंधे पर है। महिला सशक्तीकरण पर बातें हो तो हर स्थान पर कहा जाता है कि महिलाएं पुरुष के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, लेकिन यहां तो यहां महिलाएं पुरुषों से इतनी आगे हैं कि पुरुषों को उनकी बराबरी कर पाना संभव ही नहीं दिख रहा है।
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स्वास्थ्य विभाग के पिछले पांच साल के रिकॉर्ड से कई चंौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 2013-14 में जिले में 6229 महिलाओं सापेत्र एक पुरुष ने नसबंदी कराई वहीं, 2014-15 6570 महिलाओं के सापेक्ष भी इनकी संख्या एक ही रही। 2015-16 में 5981 महिलाओं ने तो नसबंदी कराई, लेकिन कोई पुरुष घर से ही नहीं निकला। 2016-17 में 5837 महिलाओं के सापेक्ष इनकी संख्या 27 रही। वहीं, जारी वित्तीय वर्ष में अभी 1390 महिलाओं के सापेक्ष अभी तक सात पुरुषों ने ही सबंदी कराई है। सरकार इस मद में लाखों रुपये खर्च कर रही है। इसके बावजूद पुरुष इसमें ज्यादा रुचि नहीं दिखा रहे हैं। यही कारण है कि नसबंदी की सबसे बेहतर कमीशन वाली योजना पूरी तरह से फ्लॉप हो रही है। नसबंदी कराने वाले पुरुषों को जहां तीन हजार रुपये देना होता है वहीं, महिलाओं को सिर्फ दो हाजर रुपये ही मिलते हैं। यही नहीं पुरुष को जागरूक कर उसका सरकारी अस्पताल में नसबंदी करवाने वाले को पांच सौ और महिलाओं को नसबंदी के लिए जागरूक करने वालों को तीन सौ रुपये मिलते हैं।
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लक्ष्य से काफी पीछे है विभाग
आजमगढ़। स्वास्थ्य विभाग को पहले 24085 नसबंदी सलाना करने का लक्ष्य होता था। सीएमओ डॉ. एसके तिवारी ने बताया कि 10 साल पहले इस लक्ष्य को समाप्त कर इसके अधिक से अधिक नसबंदी करने के निर्देश दिए गए। फिर भी स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों को देखे तो ये संतुष्टी योग्य नहीं है। हालांकि इस बारे में स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि परिवार नियोजन के लिए परिवारों की ओर से अब कापर टी, कंडोम और अन्य प्रकार के उपायों को अपनाया जा रहा है। इससे नसबंदी के ग्राफ पर असर पड़ रहा है।
घट रहे नसबंदी का ग्राफ
आजमगढ़। नसबंदी के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों को देख तो इसमें लगातार गिरावट हो रही है। 2014-15 में जहां 6570 महिलाओं ने नसबंदी कराई थी, वहीं 2015-16 में घट कर ये 5970 हो गया। 2016-17 में ये और घटकर 5837 तक पहुंच गया। चालू वित्तीय वर्ष में ये आंकड़ा अभी 1390 तक ही पहुंच पाया है।
ज्यदा प्रोत्साहन राशि, फिर भी नहीं बढ़ा उत्साह
आजमगढ़। तमाम संसाधन उपलब्ध होेने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग पुरुषों में नसबंदी को लेकर उत्साह नहीं बढ़ा पा रहा है। जो पुरुष नसबंदी के लिए पहुंचते भी हैं वो प्रोत्साहन राशि के लालच में आते हैं। इसमें ज्यादातर गरीब और मजदूर तबके के होते हैं। कई बार तो विकलांगों को पकड़कर स्वास्थ्य विभाग अपना आंकड़ा बढ़ाने की कोशिश करता है।
नसबंदी के बोलते आंकड़े
वर्ष पुरुष महिला
2017-18 07 1390
2016-17 27 5837
2015-16 0 5981
2014-15 01 6570
2013-14 01 6229
नसबंदी के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार किया जाता है। परिवार नियोजन के अन्य उपाय भी लोगों को पसंद आने लगे हैं। इससे नसबंदी के ग्राफ में कमी आई है। पुरुषों में भ्रातियों को लेकर उत्साह नहीं आ पा रहा है, जबकि इससे शारीरिक क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है। नसबंदी किसी भी मौसम में कराई जा सकती है।
डॉ.एसके तिवारी सीएमओ